इसके बाद शव को मोटरसाइकिल पर अख्याल पुल तक पहुंचाया और नदी में फेंक दिया। नायलॉन की रस्सी, चोरी के कपड़े, ऊनी स्टॉल, खून से सने गत्ते और बालों के रेशे सहित भौतिक साक्ष्य बरामद किए गए और फोरेंसिक विश्लेषण की ओर से आरोपी और मृतक से उनका मिलान किया गया। आरोपी ने जांचकर्ताओं के सामने अपनी विकलांगता के बावजूद मृतक के शव को उठाने की अपनी क्षमता का भी प्रदर्शन किया।
मुकदमे के दौरान अब्दुल मजीद खान ने हत्या और उसके बाद अपराध को छिपाने के प्रयासों को स्वीकार करते हुए एक औपचारिक प्रकटीकरण बयान दिया। अभियोजन पक्ष ने एफएसएल श्रीनगर की फोरेंसिक रिपोर्ट, गवाहों के बयानों और जब्ती ज्ञापनों की ओर से समर्थित मजबूत परिस्थितिजन्य साक्ष्य प्रस्तुत किए।
बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि अभियुक्त की शारीरिक विकलांगता के कारण उसके लिए अपराध करना असंभव था लेकिन अदालत ने दस्तावेजी साक्ष्यों और जांच के दौरान किए गए परीक्षणों के आधार पर इस दावे को खारिज कर दिया।
साक्ष्यों का मूल्यांकन करते हुए गांदरबल के प्रधान सत्र न्यायाधीश अब्दुल नासिर ने अब्दुल मजीद खान को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी पाया और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने सह-अभियुक्त निसार अहमद को शव को ठिकाने लगाने में उसकी संलिप्तता साबित करने वाले साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया।