उन्होंने प्रशासन पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार पांच अगस्त 2019 के बाद घाटी में बदलाव और शांति के दावे कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से मेल नहीं खाती। घाटी में सुरक्षा हालात जस के तस बने हुए हैं। उनके अनुसार वर्ष 2019 से अब तक 52 अल्पसंख्यकों की हत्या हो चुकी है, जिसमें बैसरन में पर्यटकों पर हुआ हमला भी शामिल है।
राकेश ने कहा कि बहुसंख्यक समुदाय के भी कई स्थानीय नागरिक और पुलिसकर्मी आतंकी हिंसा के शिकार हुए हैं। यदि कश्मीर में हालात सामान्य हो चुके हैं तो आए दिन अल्पसंख्यकों की पहचान उजागर कर उन्हें निशाना बनाने वाले धमकी भरे पत्र क्यों सामने आ रहे हैं। उन्होंने मामले में कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
पुराने मामलों की जांच तेज होने से बौखलाए आतंकी संगठन
कश्मीर मामलों के जानकार अमित कौल बताते हैं कि कश्मीरी पंडितों से जुड़े पुराने मामलों की जांच तेज होने से आतंकी संगठन बौखलाए हुए हैं। जम्मू-कश्मीर की स्टेट इंवेस्टिगेशन एजेंसी (एसआईए) वंधामा नरसंहार और जाने-माने कश्मीरी पंडित टीका लाल टपलू की हत्या के मामलों की जांच कर रही है। सरला भट और सर्वानंद कौल के मामलों की जांच में भी तेजी आई है। एसआईए ने जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या की जांच भी तेज कर दी है। दूसरी ओर, कश्मीर में पंडितों की घर वापसी की स्वीकार्यता भी बढ़ी है। कश्मीरी मुसलमान खुद आगे आ रहे हैं। यही कारण है कि आतंकी कश्मीरी पंड़ितों को धमकाकर डराने की कोशिश कर रहे हैं।
लश्कर से सामने आया जुड़ाव
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार यूएलसी लश्कर-ए-ताइबा का ही एक सहयोगी आतंकी संगठन है। यह लगातार कश्मीरी पंड़ितों को निशाना बनाने की धमकी दे रहा है। आतंकी संगठन की ओर से जारी पत्रों में कर्मचारियों को घाटी में अपने कार्यालयों में नहीं आने की चेतावनी जारी की जा रही है।