जेड मोड़ टनल का सपना अगर आज साकार हुआ है तो उन लोगों की बदौलत जिन्होंने दीवानगी की हद तक काम किया। उनका एक ही मिशन था-इस सुरंग को बनाना। काम के दौरान आतंकी हमला भी हुआ। जानें गईं। फिर भी कदम रुके नहीं। प्रोजेक्ट अपनी रफ्तार से चलता रहा। आखिरकार जेड मोड़ टनल मिशन कामयाब हुआ।
कारगिल के युद्ध के दौरान सेना के साजो-सामान दुर्गम पहाड़ियों तक पहुंचाने के लिए सुरक्षित रास्ते की जरूरत महसूस हुई। ऐसा रास्ता जो बर्फबारी में बंद न हो। सातों दिन चौबीसों घंटे खुला रहे। वर्ष 2015 में इस टनल को आकार देने की कोशिश हुई। पर, आर्थिक बाधाओं की वजह से उस पर ब्रेक लग गया। आखिरकार 24 जून 2020 को इसका काम फिर से शुरू हुआ।
अयोध्या की कंपनी एपको श्री अमरनाथजी टनल वे प्राइवेट लिमिटेड और एपको इंफ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड ने काम संभाला।काम में लगे प्रवासियों को देखते हुए आतंकियों ने प्रवासियों पर हमले शुरू कर दिए। मंसूबा यही था कि टनल का काम करने वाले प्रवासियों में दहशत पैदा की जा सके। पर, इस सबका असर सुरंग बनाने वाली टीम पर नहीं हुआ। जुलाई 2024 में टनल का काम पूरा हुआ। जब इसे शुरू करने की बारी आई तो आतंकियों ने प्रोजेक्ट से जुड़े प्रवासियों को सीधे तौर पर निशाना बनाया। 20 अक्तूबर 2024 को गांदरबल में आतंकियों ने गोलियां बरसाकर एक डॉक्टर व छह प्रवासी श्रमिकों की जान ले ली।
इनके योगदान को नमन20 अक्तूबर को हुए आतंकी हमले में जिन्होंने जान गंवाई उनमें डाॅ.शाहनवाज, फहीम नजीर, कलीम, मोहम्मद हनीफ, शशि अबरोल, अनिल शुक्ला और गुरमीर सिंह शामिल थे। आज जब टनल का उद्घाटन होने जा रहा है, तो हम इनके योगदान को भुला नहीं सकते। हमारी तरक्की, सुरक्षा में आतंकी हमले में जान गंवाने वालों का योगदान हमेशा याद किया जाएगा।
चुनौतियां बहुत थीं...रास्ते निकालेमनीष चतुर्वेदी, निदेशक एपको
जेड टनल परियोजना की राहों में चुनौतियां बहुत थीं। मौसम की चुनौती, सुरक्षा की चुनौती, हिमालय परिक्षेत्र में पहाड़ काटने की चुनौती, हिमालय सबसे युवा पहाड़ कहा जाता है। यहां की भौगोलिक संरचना में काम करने के जोखिम अलग थे।हमें माइनस 20 डिग्री सेल्सियस से लेकर 20 डिग्री सेल्सियस तक तापमान के उतार-चढ़ाव के बीच काम करना था। टीम काम कर सके, इसके लिए विश्वस्तरीय कैंप तैयार किए गए। हर जरूरत का ध्यान रखा गया। उपकरण जुटाए गए। चिकित्सा व्यवस्थाएं की गईं।
सुरक्षा की बात करें तो यह हमारे लिए दूसरी बड़ी चुनौती थी। सुरक्षा व्यवस्था मिल भी जाए तो भी आतंकी हमलों के खौफ से लोग काम करने को तैयार नहीं होते। यानी टीम के अंदर से डर निकालने और उन्हें काम करने के लिए तैयार करने की चुनौती भी हमारे सामने थी। हमने यह भी कर दिखाया। पर, दुखद रहा कि हमें आतंकी हमले में अपने सात साथियों को खोना पड़ा।