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Srinagar News: आज भी जिंदगी के पटरी पर लौटने का इंतजार

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बारामुला के उड़ी में अपनी बात रखता स्थानीय निवासी। संवाद - फोटो : 1
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-ऑपरेशन सिंदूर के दौरान गोलाबारी के एक साल बाद भी सीमावर्ती कस्बे के लोग खुद को कर रहे असुरक्षित महसूस
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- उड़ी के निवासी सामुदायिक बंकर बनाने की कर रहे हैं मांग, एक साल में कोई प्रगति नहीं

साकिब नबी
उड़ी (बारामुला)। उत्तरी कश्मीर के सीमावर्ती जिले के लोग आज भी जिंदगी के पटरी पर लौटने का इंतजार है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद पिछले वर्ष मई में शुरू हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की गोलीबारी से काफी नुकसान हुआ था। लगभग एक साल बाद भी लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
बारामुला जिले में स्थित उड़ी सेक्टर में पाकिस्तानी गोलाबारी से हुए नुकसान के निशान आज भी ताजा हैं। क्षतिग्रस्त घर, दुकानें और तबाह हो चुके वाहन मई 2025 में संघर्ष विराम उल्लंघन और ड्रोन हमलों के बाद बढ़े तनाव की याद दिलाते हैं। हालांकि पुनर्निर्माण के प्रयास जारी हैं लेकिन कई निवासियों के लिए वापस उस स्थिति में आने की प्रक्रिया अब भी अधूरी है।
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गोलाबारी के दौरान विस्थापन और भारी नुकसान झेलने वाले कई परिवार अनिश्चितता के बीच अपने जीवन को फिर से संवारने में लगे हुए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि भले ही समय बीत गया हो लेकिन सुरक्षा के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा अभी भी नदारद है। निवासियों ने चिंता जताई है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी कोई सामुदायिक बंकर नहीं बनाया गया है जिससे भविष्य में तनाव बढ़ने की स्थिति में वे असुरक्षित रह जाएंगे।
स्थानीय निवासी बशारत ने प्रशासन और सरकार से तत्काल कार्रवाई करने का आग्रह करते हुए कहा कि गोलाबारी या किसी भी आपात स्थिति के दौरान हम अभी भी खतरे में रहते हैं। नागरिकों की सुरक्षा के लिए बंकरों की तत्काल आवश्यकता है। सीमा पर रहने वाले लोग इस बात पर जोर देते हैं कि शांति के प्रयास महत्वपूर्ण हैं लेकिन सुरक्षा के बुनियादी उपायों को सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।
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फारूक अहमद ने कहा कि गोलाबारी के बाद बड़े-बड़े दावे किए गए थे। योजनाएं प्रस्तावित की गई थी लेकिन अगर आज के दौर में पाकिस्तान गोलाबारी करता है तो वही स्थिति होगी जो एक साल पहले थी। बता दें कि स्थानीय लोग अधिकारियों से आग्रह कर रहे हैं कि वे संवेदनशील क्षेत्रों में सामुदायिक बंकरों के निर्माण को प्राथमिकता दें ताकि लोगों की जान बचाई जा सके और सीमावर्ती आबादी के बीच विश्वास मजबूत हो सके। संवाद
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