अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। कश्मीर की परंपरागत लोक नाट्य शैली बांड-ए-पाथर जल्द ही बड़े पर्दे पर दिखाई देगी। यह महज एक फिल्म नहीं बल्कि एक प्रोजेक्ट है, जिसका मकसद एक परंपरा को दस्तावेज के रूप में सहेजना है।
इसे बनाने वाले अली इमरान और याकूत मुश्ताक का कहना है कि फिल्म में लोक कलाकार, गनी भगत और उनके बेटे अख्तर की कहानी कहती है। इसमें दो पीढ़ियों के बीच के अंतर और कला की रीतियों में आए बदलावों को दिखाया गया है।
‘बांड-ए-पाथर’ एक ऐसी परंपरा है जिसमें संगीत, व्यंग्य और कहानी कहने का मेल होता है। ऐतिहासिक रूप से इसे ग्रामीण इलाकों में प्रस्तुत किया जाता रहा है। फिल्म बनाने वालों का कहना है कि इस प्रोजेक्ट का मकसद एक कहानी के रूप में इस कला शैली के अलग-अलग पहलुओं को दर्शकों के सामने लाना है। इस फिल्म की शूटिंग कई अलग-अलग जगहों पर की गई है और इसमें इसी पारंपरिक नाट्य शैली से जुड़े कलाकारों ने ही अभिनय किया है।
इस फिल्म के प्रीमियर के मौके पर फिल्म जगत और सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े कई लोगों के जुटने की उम्मीद है। यह एक कश्मीरी भाषा की फिल्म की स्क्रीनिंग होगी जिसका विषय पूरी तरह से एक पारंपरिक परंपरा पर आधारित है।