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Srinagar News: हाईकोर्ट ने की सरकार व उसके अधिकारियों की मनमानी भर्ती की आलोचना

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केयू की ओर से हायर एंड फायर आधार पर रखे गए तीन जेई को पक्का करने की याचिका खारिज
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संवाद न्यूज एजेंसी

श्रीनगर। यह दोहराते हुए कि सरकारी नौकरियों में समानता और निष्पक्ष अवसर के संवैधानिक आदेश का सख्ती से पालन होना चाहिए, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि राज्य सरकार ऐसे एडहॉक, अस्थायी, समेकित या संविदा कर्मचारियों को पक्का करने के लिए नीतियां नहीं बना सकती जिन्हें बिना किसी विज्ञापन और उचित चयन प्रक्रिया के नियुक्त किया गया था।

जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने आगे कहा कि सांविधानिक अदालतें ऐसे चोर-रास्ते से आए लोगों को पक्का करने के निर्देश नहीं दे सकतीं, खासकर उन योग्य उम्मीदवारों की कीमत पर, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के अनुसार सरकारी पदों के लिए प्रतिस्पर्धा करने का अवसर नहीं मिला।
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अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आधार पर ये टिप्पणियां कीं, और साथ ही कश्मीर विश्वविद्यालय (केयू) की ओर से संविदा आधार पर हायर एंड फायर (जब चाहें रखने और निकालने) की शर्त पर रखे गए तीन जूनियर इंजीनियरों की ओर से दायर याचिकाओं के समूह को खारिज कर दिया।

याचिकाकर्ताओं ने केयू द्वारा 30 मार्च, 2026 को जारी विज्ञापन अधिसूचना को चुनौती दी थी जिसके तहत खुली चयन प्रक्रिया के माध्यम से जूनियर इंजीनियर (इलेक्ट्रिकल) के एक पद और जूनियर इंजीनियर (सिविल) के दो पदों को भरा जाना था।

याचिकाकर्ताओं को जनवरी 2017 में विश्वविद्यालय द्वारा 15,000 रुपये के समेकित मासिक वेतन पर नियुक्त किया गया था जिसे विश्वविद्यालय ने हायर एंड फायर व्यवस्था बताया था। उनकी संविदा नियुक्तियों को समय-समय पर बढ़ाया जाता रहा, और आखिरी विस्तार इस साल 22 मई तक वैध था।

यह आशंका होने पर कि नियमित भर्ती के परिणामस्वरूप उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाएगा, याचिकाकर्ताओं कैट (केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण) का दरवाजा खटखटाया और विज्ञापन अधिसूचना को रद्द करने तथा अपनी सेवाओं को पक्का करने के निर्देश देने की मांग की। जब न्यायाधिकरण ने अंतरिम राहत देने से इन्कार कर दिया तो मामला हाईकोर्ट पहुंच गया।

डिवीजन बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को बिना किसी विज्ञापन या प्रतिस्पर्धी चयन प्रक्रिया के नियुक्त किया गया था और संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत सरकारी नौकरियों में समानता के संवैधानिक आदेश का उल्लंघन करते हुए उनकी नियुक्तियों को पक्का नहीं किया जा सकता। उन्होंने सरकारों और सरकारी संस्थाओं द्वारा अपनाई जा रही उस पुरानी प्रथा की आलोचना की जिसके तहत अस्थायी, संविदा या दैनिक वेतन के आधार पर बैकडोर'''' नियुक्तियां की जाती हैं और बाद में ऐसे नियुक्त व्यक्तियों को नियमित करने का प्रयास किया जाता है।
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सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए बेंच ने याचिकाकर्ताओं को यह राहत दी कि वे चल रही भर्ती प्रक्रिया में हिस्सा ले सकते हैं, बशर्ते वे इसके लिए योग्य हों। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अगर 2017 में उनकी शुरुआती नियुक्ति के समय वे तय उम्र सीमा के अंदर थे, तो उन्हें उम्र में छूट दी जाए।

उन्हें आवेदन करने में मदद करने के लिए कोर्ट ने फैसले की तारीख से 15 दिन का अतिरिक्त समय दिया, ताकि वे अपने आवेदन फॉर्म जमा कर सकें।
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