- उच्च न्यायालय ने हिरासत को गैर-कानूनी और कानून की नजर में अमान्य करार दिया
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने सोमवार को पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) के तहत दो लोगों की निवारक हिरासत को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने उनकी हिरासत को गैर-कानूनी और कानून की नजर में अमान्य करार दिया।
जस्टिस राहुल भारती की बेंच ने सोपोर के लोगरीपोरा जैनगीर के 36 वर्षीय निवासी इरफान मजीद लोन के खिलाफ जारी हिरासत आदेश को रद्द कर दिया। यह हिरासत आदेश पिछले साल 28 अप्रैल को बारामुला के जिला मजिस्ट्रेट ने जारी किया था जिसमें उन गतिविधियों का हवाला दिया गया था जिन्हें कथित तौर पर सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए हानिकारक माना गया था।
अदालत ने यह टिप्पणी की कि हिरासत के आधार पुरानी सामग्री पर आधारित थे और वे निवारक हिरासत लागू करने को उचित नहीं ठहराते थे। अदालत ने आगे यह भी कहा कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति पर लगाए गए आरोप कानून-व्यवस्था के दायरे में आते थे न कि सार्वजनिक व्यवस्था के जो कि पीएसए के तहत हिरासत के लिए एक आवश्यक और महत्वपूर्ण अंतर है।
सरकार के रुख को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि हिरासत सजा देने वाली लगती है जो बचाव के उपायों की आड़ में की गई थी। इसलिए कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे बंदी को तुरंत हिरासत से रिहा कर दें जब तक कि किसी दूसरे मामले में इसकी जरूरत न हो।
इस बीच, अदालत ने बांदीपोरा के हाजिन स्थित बांगर मोहल्ला के 27 वर्षीय सुहैल अहमद पारे के खिलाफ पीएसए के तहत जारी हिरासत आदेश को रद्द कर दिया। यह हिरासत आदेश बांदीपोरा के जिला मजिस्ट्रेट ने 1 मई 2025 को जारी किया था जिसमें सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कथित रूप से हानिकारक गतिविधियों का हवाला दिया गया था। संवाद