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तय हो चुकी वरिष्ठता को ‘किनारे’ बैठे लोगों के कहने पर बदला नहीं जा सकता : हाईकोर्ट

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संवाद न्यूज एजेंसी
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने बुधवार को न्यायिक अधिकारियों की वरिष्ठता सूची को चुनौती देने वाली एक याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भविष्य की खाली जगहों के लिए नियुक्त उम्मीदवार, पिछली चयन प्रक्रिया में अपनी मेरिट के आधार पर वरिष्ठता का दावा नहीं कर सकते।
जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने यह भी कहा कि एक बार वरिष्ठता तय हो जाने और उस पर अमल हो जाने के बाद किनारे बैठे लोगों (जो पहले चुप रहे) के कहने पर उसे बदला नहीं जा सकता।
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तबस्सुम कादिर पारे, मयंक गुप्ता, सज्जाद-उर-रहमान और अल्ताफ हुसैन खान द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए, जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस संजय परिहार की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया कि ये चारों न्यायिक अधिकारी, 2010 के चयन में अपनी मेरिट पोजीशन के बावजूद, वरिष्ठता लिस्ट में ऊपर रखे जाने के हकदार नहीं थे।
याचिकाकर्ताओं ने 2011 की वरिष्ठता सूची को रद्द करने की मांग की थी। उनका तर्क था कि पब्लिक सर्विस कमीशन द्वारा किए गए चयन में उनकी मेरिट (16वीं, 17वीं, 18वीं और 26वीं रैंक) के अनुसार उन्हें रैंक दी जानी चाहिए। हालांकि कोर्ट ने पाया कि भर्ती के समय केवल 31 खाली जगहें थीं और याचिकाकर्ता उन चार अतिरिक्त उम्मीदवारों में शामिल थे जिनका चयन एक लिपिकीय गलती के कारण हुआ था, जिसके चलते 35 पदों का विज्ञापन जारी हो गया था।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि जहां 31 उम्मीदवारों को अप्रैल 2011 में उपलब्ध खाली जगहों के लिए नियुक्त किया गया था, वहीं याचिकाकर्ताओं को बाद में सितंबर 2011 में भविष्य की खाली जगहों के लिए नियुक्त किया गया था जो प्रमोशन के कारण पैदा हुई थीं।
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बेंच ने फैसला सुनाया, भविष्य की खाली जगहों के लिए नियुक्त उम्मीदवार एक अलग श्रेणी बनाते हैं और स्पष्ट खाली जगहों के लिए नियुक्त लोगों पर वरिष्ठता का दावा नहीं कर सकते।
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