- कश्मीरी भाषा में बनी यह फिल्म जम्मू में रहने वाले एक विस्थापित कश्मीरी पंडित परिवार का दर्द बयां करती है
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। शहर के सोनवार इलाके में स्थित एक सिनेमा हॉल में रविवार को कश्मीरी फिल्म बट कोच की स्क्रीनिंग के लिए बड़ी संख्या में दर्शक उमड़े। कश्मीरी भाषा की यह फिल्म विस्थापित कश्मीरी पंडित परिवार की भावनात्मक यात्रा को दर्शाती है। उनका दर्द बयां करती है जो विस्थापन के दशकों बाद कश्मीर लौटना चाहता है।
इस स्क्रीनिंग में लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इससे पता चलता है कि स्थानीय स्तर पर बनी उन फिल्मों में लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है जो कश्मीर की सामाजिक और सांस्कृतिक कहानियों को बयां करती हैं। यह घटनाक्रम इसलिए भी खास है क्योंकि यह कश्मीर के फिल्म जगत में नई जान फूंकने का संकेत देता है जहां स्थानीय फिल्मकार अपने क्षेत्र की कहानियों को मुख्यधारा के दर्शकों तक पहुंचा रहे हैं।
श्रीनगर के उपायुक्त अक्षय लाबरू भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए। उन्होंने फिल्मकारों के काम की तारीफ की। लाबरू ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि यह हमारा बहुत बड़ा सौभाग्य है कि हमारे कश्मीर के दो युवा निर्देशकों सिद्धार्थ और अंकित ने श्रीनगर पर आधारित एक फिल्म बनाई है जिसका नाम ‘बट कोच’ है। इसकी कहानी श्रीनगर शहर और एक खास परिवार पर केंद्रित है। यह एक बेहद भावनात्मक कहानी है। आज वे अपनी कहानी पेश करने के लिए श्रीनगर के इस सिनेमा में पहुंचे हैं। इस फिल्म को देखने के लिए हमारे समुदाय से भारी भीड़ यहां जमा हुई है। हम सभी इस फिल्म को अपना पूरा समर्थन देने की कोशिश कर रहे हैं।
सिद्धार्थ कौल और अंकित वली की ओर से निर्देशित फिल्म बट कोच जम्मू में रहने वाले एक विस्थापित कश्मीरी पंडित परिवार के जीवन पर आधारित है। इसकी कहानी एक बुजुर्ग व्यक्ति पुष्कर नाथ कौल के इर्द-गिर्द घूमती है जो अपनी याददाश्त खोने की समस्या से जूझ रहा है। वह विस्थापन के दशकों बाद अनंतनाग के मट्टन में अपने पुश्तैनी घर लौटना चाहते हैं।
यह फिल्म विस्थापन के लंबे समय तक बने रहने वाले भावनात्मक असर पर केंद्रित है जिसमें सीधे टकराव के बजाय यादों, अपनेपन और पहचान को ज्यादा महत्व दिया गया है। इस फिल्म में दिग्गज अभिनेता एमके रैना मुख्य भूमिका में हैं। उनके साथ कुसुम धर, कुसुम टिकू और अनिल कौल (चिंगारी) भी भूमिका निभा रहे हैं।
ऐसी फिल्में बननी चाहिए : अनिल
दर्शकों ने इस फिल्म को भावनात्मक और अपने जीवन से जुड़ा हुआ बताया। कई दर्शकों ने फिल्म में व्यक्तिगत कहानियों और सांस्कृतिक यादों पर दिए गए जोर की तारीफ की। स्क्रीनिंग के बाद एक दर्शक अनिल ने कहा कि यह हमारे अतीत और हमारी भावनाओं से गहराई से जुड़ती है। ऐसी फिल्में बननी चाहिए ताकि सच्चाई लोगों के सामने आ सके। आतंकवाद, खून खराबे आदि पर सब फिल्में बनाते रहे हैं लेकिन असली कहानी इस तरह बनाई जाती है। हम युवा निर्देशकों को बधाई देना चाहते हैं।
नवंबर 2025 में श्रीनगर के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हुआ था प्रीमियर
अधिकारियों और आयोजकों ने कहा कि इस तरह की फिल्में सांस्कृतिक कहानियों को सहेजने और क्षेत्रीय भाषाओं में स्थानीय कहानियों को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाती हैं। बट कोच का प्रीमियर इससे पहले नवंबर 2025 में श्रीनगर के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हुआ था। इसके बाद इसे जम्मू और दिल्ली में भी दिखाया गया जहां इसे काफी अच्छा समर्थन मिला।
कश्मीरी लोक परंपराओं पर आधारित मूल संगीत भी शामिल
इस फिल्म में कश्मीरी लोक परंपराओं पर आधारित मूल संगीत भी शामिल है जो इसकी सांस्कृतिक प्रामाणिकता को और भी बढ़ा देता है। पृष्ठभूमि के संदर्भ से पता चलता है कि हाल के वर्षों में कश्मीर की फिल्म इंडस्ट्री में नए सिरे से प्रयास किए जा रहे हैं। इसमें फिल्म निर्माता क्षेत्रीय और व्यापक दोनों तरह के दर्शकों के लिए स्थानीय विषयों और कहानियों को ज्यादा से ज्यादा तलाश रहे हैं।