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Srinagar News: चरार-ए-शरीफ में कांगड़ी कारीगरों पर मंदी की मार, विद्युत उपकरणों से मांग घटी

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- दुल्हन और सजावटी डिजाइनों के सहारे टिका कारोबार, बीच पारंपरिक हस्तशिल्प को बचाने में जुटे कारीगर
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- गिरती मांग के बीच युवा पीढ़ी के घटते रुझान ने बढ़ाई चिंता

अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। घाटी में सर्दी की दस्तक के साथ ही मध्य कश्मीर के बडगाम जिले के चरार-ए-शरीफ कस्बे में पारंपरिक कांगड़ी बनाने वाले कारीगर दिन-रात मेहनत में जुटे हैं। हालांकि, आधुनिक हीटिंग और बिजली उपकरणों के बढ़ते चलन के कारण गिरती मांग ने इन पारंपरिक दस्तकारों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।
अपने इस पुश्तैनी हुनर और कारोबार को जिंदा रखने के लिए कारीगर अब पारंपरिक कांगड़ी के अलावा शादी-ब्याह के लिए खास दुल्हन कांगड़ी और सजावटी शोपीस बनाने की ओर रुख कर रहे हैं। चरार-ए-शरीफ उन हुनरमंद कारीगरों का प्रमुख केंद्र है जो रोजमर्रा की गर्माहट के लिए इस्तेमाल होने वाली आम कांगड़ी से लेकर खास डिजाइनों वाली ब्राइडल कांगड़ी, सजावटी कलाकृतियां और छोटे आकार के शोपीस तैयार करते हैं।
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मिट्टी के बर्तन (कूंड) और विलो विकर (बेंत) की महीन बुनाई से तैयार होने वाली कांगड़ी कश्मीरियों की सर्दी की जीवनशैली का अहम हिस्सा रही है, जिसे हाड़ कंपाने वाली ठंड में फिरन के भीतर रखकर शरीर को गर्म रखा जाता है। विलो-विकर हस्तशिल्प में वर्ष 2022 का यूटी अवार्ड (द्वितीय पुरस्कार) हासिल कर चुके वरिष्ठ कारीगर बशीर अहमद ने बताया कि पिछले कुछ सालों में कांगड़ी के इस्तेमाल में भारी गिरावट आई है। पहले लगभग हर घर में कांगड़ी का इस्तेमाल होता था लेकिन अब लोग इसका इस्तेमाल कम कर रहे हैं क्योंकि बिजली के हीटर और ब्लोअर आम हो गए हैं। हम इस पारंपरिक कला को बचाए रखने के लिए दुल्हन कांगड़ी और सजावटी उत्पाद जैसी नई किस्में तैयार कर रहे हैं।
चार से पांच दशकों से इस काम से जुड़े बशीर ने बताया कि उनकी कार्यशाला में पांच से आठ कारीगर काम करते हैं और वे सालाना लगभग 5,000 से 6,000 कांगड़ियां तैयार करते हैं। उन्होंने बताया कि इनकी बिक्री मुख्य रूप से नवंबर से फरवरी के चार महीनों के दौरान ही होती है। चरार-ए-शरीफ की विशिष्ट पहचान का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र विशेष रूप से दुल्हन की कांगड़ी के लिए मशहूर है जिसे स्थानीय भाषा में माहरीन कांगड़ी कहा जाता है।
सामान्य कांगड़ी को बनाने में दो से तीन घंटे लगते हैं
करीब पिछले 20 वर्षों से कांगड़ी बना रहे एक अन्य स्थानीय कारीगर बशारत ने बताया कि कस्बे में विभिन्न किस्मों की कांगड़ी के अलावा विलो-विकर से गमले, बड़े सजावटी सामान और लघु कांगड़ियां भी बनाई जाती हैं। एक सामान्य कांगड़ी को बनाने में लगभग दो से तीन घंटे का समय लगता है जिसमें मिट्टी के बर्तन के चारों ओर स्थानीय स्तर पर जुटाई गई विलो की तीलियों की बारीक बुनाई की जाती है। बशारत ने कारोबार में आई मंदी पर चिंता जताते हुए कहा कि पहले जब पूरी घाटी में इसका व्यापक उपयोग होता था, तब बड़ी संख्या में कांगड़ियों की बिक्री होती थी लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।
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हस्तशिल्प सीखने में घटती दिलचस्पी बनी चिंता का सबब
कारीगरों का कहना है कि बिजली के हीटिंग उपकरणों के बढ़ते उपयोग और लोगों की बदलती प्राथमिकताओं ने बाजार को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। इसके अलावा नई पीढ़ी की ओर से इस पारंपरिक हस्तशिल्प को सीखने में घटती दिलचस्पी भी एक बड़ी चिंता का सबब बन गई है। कारीगरों ने प्रशासन से गुहार लगाई है कि वे कल्याणकारी योजनाओं, वित्तीय सहायता और युवाओं को इस हस्तकला से जोड़ने वाले विशेष कार्यक्रमों के जरिए पारंपरिक दस्तकारों को सहारा दें। इन तमाम चुनौतियों के बावजूद, चरार-ए-शरीफ के कारीगर कश्मीर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पहचान से जुड़े इस हुनर को संजोने में लगे हुए हैं।
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