विशेष न्यायाधीश प्रेम सागर ने 20 अगस्त को दिए 15 पन्नों के आदेश में कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए की धारा 43-डी(5) के तहत जमानत पर रोक भी इस मामले में लागू होती है।
इंशा जान को उसके पिता पीर तारिक अहमद शाह के साथ 3 मार्च 2020 को गिरफ्तार किया गया था। वह दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले के हरकीपोरा गांव की रहने वाली है। उसके खिलाफ रणबीर दंड संहिता (आरपीसी), यूएपीए, आर्म्स एक्ट और एक्सप्लोसिव सब्सटेंस एक्ट के तहत मुकदमा चल रहा है। अदालत ने 10 दिसंबर 2022 को उसके खिलाफ आरोप तय किए थे।
आतंकियों को पनाह और मदद देने का आरोप
एनआईए की चार्जशीट के मुताबिक इंशा जान पर पुलवामा हमले की साजिश में शामिल होने और पाकिस्तानी आतंकी मोहम्मद उमर फारूक के लगातार संपर्क में रहने का आरोप है। एजेंसी का दावा है कि उसने जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों को अपने घर में खाना, ठिकाना और अन्य जरूरी मदद मुहैया कराई।
एनआईए के अनुसार फारूक और एक अन्य पाकिस्तानी आतंकी मोहम्मद कामरान अली जून 2018 में इंशा के घर आए थे। बाद में दोनों समेत अन्य जैश आतंकियों का उसके घर आना-जाना शुरू हो गया। एजेंसी ने यह भी दावा किया कि जनवरी 2019 में उमर फारूक, पुलवामा हमले का आत्मघाती हमलावर आदिल अहमद डार और समीर अहमद डार उसके घर आए थे और कई दिनों तक वहां रुके थे।
एनआईए ने यह भी आरोप लगाया कि 14 फरवरी 2019 के हमले के बाद वायरल हुआ आदिल अहमद डार का वीडियो 28 और 29 जनवरी को इंशा के घर पर रिकॉर्ड किया गया था। जांच एजेंसी ने उमर फारूक के मोबाइल फोन से बरामद व्हाट्सऐप कॉल, वॉयस नोट्स और तस्वीरों को भी मामले में अहम साक्ष्य बताया है।
बचाव पक्ष ने छह साल से अधिक हिरासत का दिया हवाला
इंशा जान की ओर से दायर जमानत याचिका में कहा गया कि वह छह साल से अधिक समय से जेल में है और मुकदमे की सुनवाई बेहद धीमी गति से चल रही है। बचाव पक्ष के मुताबिक कुल 240 गवाहों में से उस समय तक केवल 49 गवाहों के बयान दर्ज हुए थे।
बचाव पक्ष ने दावा किया कि जिन गवाहों की अब तक गवाही हुई है, उन्होंने इंशा को सीधे या परोक्ष रूप से अपराध से नहीं जोड़ा है और उसके पास से कोई आपत्तिजनक सामग्री भी बरामद नहीं हुई है। याचिका में उसकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का भी हवाला दिया गया।
एनआईए ने जमानत का किया विरोध
एनआईए ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि मामला बेहद गंभीर है और आरोपी ने आतंकियों को सुरक्षित ठिकाना तथा अन्य जरूरी सहायता उपलब्ध कराई थी। एजेंसी ने अदालत के सामने यूएपीए की धारा 43-डी(5) का भी हवाला दिया।
अदालत ने कहा कि केस डायरी और चार्जशीट में उपलब्ध सामग्री को देखने के बाद आरोपी के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सही मानने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं। अदालत ने यह भी कहा कि यदि आरोपी को जमानत दी गई तो महत्वपूर्ण गवाहों को प्रभावित करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
स्वास्थ्य के आधार पर भी राहत नहीं
अदालत ने इंशा जान की स्वास्थ्य संबंधी दलील को भी जमानत के लिए पर्याप्त नहीं माना। आदेश में कहा गया कि उसकी बीमारी ऐसी जानलेवा स्थिति नहीं है जिसके आधार पर तत्काल जमानत दी जाए। हालांकि जेल प्रशासन को उसे सभी जरूरी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया।
अदालत ने साथ ही स्पष्ट किया कि जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों का मुख्य आपराधिक मुकदमे के अंतिम फैसले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।