एलजी ने कहा, यह मंजिल नहीं, बल्कि नशे और नार्को टेरर के खिलाफ लंबी एवं निर्णायक लड़ाई का पहला महत्वपूर्ण पड़ाव है। अब युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को छोड़ा नहीं जाएगा। नशा तस्करों को संरक्षण देने वालों की अब खैर नहीं है। तस्करों के पूरे नेटवर्क को जड़ से खत्म करेंगे। नशे की गिरफ्त में आए युवाओं के उपचार, पुनर्वास व समाज की मुख्यधारा में वापसी के लिए भी काम करेंगे।डल झील किनारे एसकेआईसीसी में समाज कल्याण विभाग की ओर से आयोजित अभियान के 100 दिन पूरे होने के समारोह में उपराज्यपाल ने कहा कि पिछले सौ दिनों में पूरे जम्मू-कश्मीर में अभूतपूर्व जनभागीदारी देखने को मिली। यह जनसमर्थन साबित करता है कि समाज अब नशे के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि आगे की राह कठिन होगी, लेकिन हमारा संकल्प पहले से अधिक मजबूत है और नार्को टेरर नेटवर्क की हर कड़ी को तोड़ा जाएगा।
अभियान के दौरान सभी 20 जिलों का दौरा किया और पदयात्रा के माध्यम से लोगों से सीधे संवाद किया। इस दौरान ऐसे परिवार मिले, जो अपने बच्चों को नशे की लत से जूझते देख गहरे दर्द में हैं। इन मुलाकातों ने यह भरोसा भी मजबूत किया कि यदि समाज, परिवार और सरकार मिलकर प्रयास करें तो युवाओं को नशे के दलदल से बाहर निकाला जा सकता है। जम्मू-कश्मीर अपने युवाओं और भविष्य को नशे की भेंट नहीं चढ़ने देगा। पिछले 100 दिनों में लोगों के सहयोग से नशा तस्करों के खिलाफ कार्रवाई तेज हुई। आगे यह अभियान और अधिक प्रभावी बनाया जाएगा। उपराज्यपाल ने चेतावनी दी कि जो लोग दूसरों की जिंदगी बर्बाद करने का प्रयास करेंगे, कानून उन्हें बख्शेगा नहीं।
समाज और सरकारी तंत्र के भीतर यदि कोई व्यक्ति नशा तस्करों को संरक्षण देता है तो उसे भी छोड़ा नहीं जाएगा। ऐसे तत्वों की पहचान कर व्यवस्था से बाहर किया जाएगा। उन्होंने नागरिक समाज, धार्मिक नेताओं और सामाजिक संगठनों से भी अपील की कि वे नशा तस्करी में शामिल लोगों की जानकारी प्रशासन तक पहुंचाएं।
नशे में फंसे युवा अपराधी नहीं, बल्कि हालात के शिकार
नशे की गिरफ्त में आए युवा अपराधी नहीं बल्कि परिस्थितियों के शिकार हैं। उन्हें दंड नहीं उपचार, परामर्श, कौशल विकास और सम्मानजनक पुनर्वास की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से तीन चरणों वाली रिहैबिलिटेशन एंड सोशल इकोनॉमिक रीइंटीग्रेशन स्कीम-2026 लागू की जा रही है।
नशे के खिलाफ यह लड़ाई केवल पुलिस या प्रशासन नहीं जीत सकती। इसमें स्कूलों, कॉलेजों, अभिभावकों, धार्मिक संगठनों और पूरे समाज की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।