दस साल बाद जम्मू-कश्मीर चुनाव प्रचार में डूबा हुआ है। गली-मोहल्लों में जम्हूरियत की बातें हो रहीं हैं। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा भी जनता के उत्साह को देख गदगद हैं। यूपी के गाजीपुर से श्रीनगर तक के सफर में पांच सालों में कश्मीरियत, जम्हूरियत के लिए उन्होंने प्रयास किए, कितना सफल रहे, कश्मीरी पंडितों से लेकर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) और जमात-हुर्रियत से लेकर चुनावों के हाल-हालात तैयार करने को लेकर सिन्हा से उपमिता वाजपेयी ने खास बातचीत की।
कश्मीर में दस साल बाद चुनाव हो रहे हैं, ऐसी क्या पहल की आपने कि कश्मीर में चुनाव लायक माहौल तैयार हो पाया?
यह कहना उचित नहीं है कि दस साल बाद चुनाव हो रहा है। देशभर में ये नैरेटिव बन रहा है। चुनाव 2019 में होना था, जो 2024 में हो रहा है। 2019 में 5 अगस्त को संसद ने अनुच्छेद-370 हटा दी। देश के गृह मंत्री ने बिल प्रस्तुत करते हुए देश की संसद में जो बात कही, उसी सीक्वेंस में चीजें आगे बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा सबसे पहले डीलिमिटेशन, क्योंकि लद्दाख निकलने के बाद जम्मू कश्मीर में 83 सीटें थीं, 7 बढ़ गईं। फिर विधानसभा चुनाव। और तीसरी बात, सही वक्त पर राज्य के दर्जे की बहाली। इसी सीक्वेंस में चीजें आगे बढ़ी हैं। 7 सीटों की हदें तय किए बिना तो चुनाव नहीं हो सकता था। उसे प्रशासन तो तय नहीं कर सकता। उसकी सांविधानिक व्यवस्था है। डिलिमिटेशन कमीशन का काम था। 2022 में ये फाइनल हुआ। अब 8 साल पुरानी वोटर लिस्ट पर चुनाव तो होता नहीं, तो उसपर काम हुआ। फिर यह निर्वाचन आयोग तय करता है, लोकसभा, विधानसभा चुनाव साथ हो या नहीं। लोकसभा चुनाव ने यह स्पष्ट किया कि 33 साल बाद अवाम ने भारत के लोकतंत्र में आस्था व्यक्त की। और जो नरैटिव बनाया जाता था कि अवाम की भलाई पड़ोसी के साथ है, यहां के लोगों ने उसे नकार कर कहा, हम भारत के लोकतंत्र के साथ हैं। 58 प्रतिशत से ज्यादा मतदान हुआ। एक भी आरोप नहीं लगा। पारदर्शी चुनाव हुआ।
हुर्रियत और जमात इस बार चुनाव लड़ रहे हैं, क्या कश्मीर में जम्हूरियत और सामान्य स्थिति होने के लिए उनका मुख्यधारा में आना जरूरी है?
केवल जम्मू-कश्मीर से नहीं, देश के दूसरे हिस्से से भी इस तरह के लोग देश की संसद और विधानसभाओं में पहुंचे हैं। अभी जो देश का कानून है, उसमें ऐसे किसी भी व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर रोक नहीं है। देश को इस पर विचार करना चाहिए। राजनीतिक दलों को एक सहमति बनानी चाहिए और भारत के निर्वाचन आयोग को एक मन्तव्य व्यक्त करना चाहिए। लेकिन हां, चुनाव में कोई भी हिस्सा ले, जो कार्रवाई पहले हुई है, आगे भी होगी, जो बैन है, बैन रहेगा। देश की एकता-अखंडता की फाइन लाइन जो क्राॅस करेगा, उसके विरुद्ध वैधानिक और सांविधानिक कार्रवाई की जाएगी, जैसे पहले होती थी।
स्थानीय पार्टी पीएसए को मुद्दा बनाकर वोट बटौरती हैं, क्या पार्टियों का पीएसए हटाना ठीक है?
पीएसए आज नए स्वरूप में हैं। जो लोग आज इस बात को उठा रहे हैं, जब उनकी सरकारें थीं, तो पीएसए जैसे बहुत से कानून लोगों पर लगाए गए। बेगुनाह लोगों की जान भी बड़ी संख्या में गई। पीएसए हो या यूएपीए, वो इसीलिए है ताकि देश की अखंडता के खिलाफ कोई कुछ करे, तो कार्रवाई की जाए। और ये सिर्फ भारत में नहीं है, जम्मू कश्मीर में अकेले नहीं, पूरी दुनिया ने ऐसे कानून बना रखे हैं।
स्थानीय लोग खुश हैं कि पत्थरबाजी खत्म हुई, हड़ताल के कैलेंडर नहीं होते, लेकिन मन में जो भ्रम था 370 को लेकर, वह अब भी है कि हमारा कुछ छिन गया है?
यह भावना कुछ लोगों के मन में है। लेकिन एक बड़ी आबादी है, जो महसूस कर रही है कि हमारी भावनाओं को भड़काने की कोशिश की गई, लेकिन इससे हमको मिला कुछ नहीं। मुझे लगता है 5 अगस्त के बाद एक बड़ी आबादी में बदलाव आया है। वह मौलिक अधिकारों से वंचित थे। 50 प्रतिशत आबादी महिलाओं की है, जो 370 के कारण जलालत झेल रहीं थीं। वो खुली हवा में सांस ले रही हैं। गुज्जर बकरवालों का हक मिला। ओबीसी का आरक्षण दोगुना कर दिया गया। कश्मीरी पंडितों, पाकिस्तानी शरणार्थियों को न्याय मिला। कई कानून देश के बाकी हिस्सों में थे, यहां नहीं थे। लेकिन 370 हटने से शांति आई है।
इसी से जुड़ा सवाल है, कुछ स्थानीय नेताओं का कहना है 370 हटने से पत्थरबाजी खत्म हुई है, आजादी का सेंटिमेंट नहीं?
लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने की आजादी है। पत्थरबाजी खत्म हुई है, यह वे स्वीकर कर रहे हैं, यही हमारी बड़ी उपलब्धि है। आजादी के सेंटिमेंट हैं, यह उनका मानना है, मेरा मानना है कि यहां के अवाम ने यह बात ठीक से समझ ली है कि हमारा भविष्य भारत के साथ है। पड़ोसी केवल गुमराह कर रहा है।
गाजीपुर से श्रीनगर का सफर तय किया है, क्या एक सा है, क्या अलग?
मानवीय संवेदना अगर हों तो आप कहीं भी काम कर सकते हैं।
यूनीफाइड कमांड के प्रमुख हैं आप, अफ्स्पा का मुद्दा उठता है, जम्मू में आतंकवाद बढ़ा है?
जब आया था कश्मीर चुनौती था। जिस जिस तंजीम का आप नाम जानती हैं, उनका कमांडर अब अपनी सही जगह पहुंच गया है। लोकल भर्ती आतंकवाद में खत्म हुई है। पड़ोसी के पेट का दर्द बढ़ गया है। हां, विदेशी आतंकवादियों को कश्मीर और जम्मू दोनों जगह घुसपैठ करवाई गई है। बड़ी संख्या में। सुरक्षाबल मुकाबला कर रहे हैं। जम्मू में 15-16 साल से आतंकवाद खत्म हो गया था। इसमें सुरक्षाबलों के अलावा वहां के अवाम की बड़ी भूमिका थी। ऊपरी इलाकों से फोर्स हटा ली थी। लेकिन अब फिर उन इलाकों में फोर्स लगा रहे हैं। डिप्लायमेंट हो गया है। पुलिस ने मोर्चा संभाल लिया है। आतंकवादी गिनने में हम विश्वास नहीं करते, उनका इकोसिस्टम खत्म कैसे किया जाए, यह प्राथमिकता होती है। शांति खरीदने में हम विश्वास नहीं करते, पूरी तरह शांति कैसे कायम हो इस पर हमारा भरोसा है। जम्मू से भी आतंकवाद जल्द नेस्तनाबूद होगा।
इतने सालों में ऐसा, जो अधूरा रह गया, अपने लिए क्या बड़ा रोल देख रहे हैं?
मैं जहां हूं बहुत खुश हूं। जम्मू-कश्मीर के हर परिवार के साथ मेरा नाता हो गया है। जब तक यहां हूं, यहां की समृद्धि और शांति के लिए काम करूंगा। मैं चाहूंगा जम्मू-कश्मीर भी बाकी राज्यों की तरह हो। इसके लिए अपनी क्षमता और सामर्थ्य से काम करूंगा।
कश्मीर में सड़क-पानी से बड़े मुद्दे होते हैं पंडितों की वापसी, जेलों से रिहाई?
डेवलपमेंट में कनेक्टिविटी का बड़ा रोल है। सड़क, रेल, एयर कनेक्टिविटी हो, डिजिटल कनेक्टिविटी, पांच साल में अभूतपूर्व काम हुआ है। पांच साल पहले जम्मू से श्रीनगर आने में 8 घंटे लगते थे, अब सिर्फ 5 घंटे। टूरिस्ट ढाई गुना बढ़े हैं। साल के आखिर तक रेल भी कश्मीर से कन्याकुमारी को जोड़ देगी। डेढ़ लाख करोड़ के हाईवे-टनल बनी हैं। कश्मीरी पंडितों का सवाल सच है। उन्हें जो संत्रास मिला, उसका वर्णन शब्दों में नहीं। सरकार ने उनके पुर्नवास के लिए काम किया है। उनके लिए जितनी नौकरियां थी, उनमें से सिर्फ 200 खाली हैं। और जो खाली हैं, वो इसलिए क्योंकि उन्हें कोई बेहतर नौकरी मिल गई है। घर तैयार है। मानता हूं सिर्फ इसी से पुर्नवास नहीं होगा। उसके भी इंतजाम किए हैं। उसके लिए एक सेल बनाया है मैंने दफ्तर में। आवाम में भी परिवर्तन आया है। वे मानने लगे हैं पंडितों के बिना कश्मीर अधूरा है। जल्दी ही यहां ललदेद के वंशज आकर रहेंगे।
लोकतांत्रिक सरकार आएगी, तो ऐसा क्या काम कर पाएगी जो आप नहीं कर पाए ?
विकास सतत प्रक्रिया है। सरकार जब आएगी तो नई चुनौती, नए काम होंगे। चार साल में मूलभूत समस्याओं के समाधान की कोशिश की। आज डिजिटल सर्विस व रोजगार पैदा करने में नंबर वन हैं। खेती से जुड़े 13 लाख परिवारों की जिंदगी में बड़ा बदलाव आया है। टूरिज्म बढ़ा है सवा लाख करोड़ के इंवेस्टमेंट प्रपोजल हमारे पास हैं।