लेह। लेह में दो दिवसीय दोस्मोचे उत्सव धार्मिक आस्था, पवित्र मुखौटा नृत्यों और श्रद्धालुओं व पर्यटकों की उत्साहपूर्ण भागीदारी के साथ रविवार को शुरू हुआ। ऐतिहासिक लेह पैलेस के निकट लेह खार में आयोजित यह उत्सव लद्दाख की स्थायी आध्यात्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।
भिक्षुओं ने पारंपरिक ‘छम’ (मुखौटा नृत्य) प्रस्तुत किया जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है और आने वाले वर्ष के लिए सुरक्षा, सद्भाव व समृद्धि की प्रार्थना करता है। यह उत्सव कठोर सर्दियों के अंत का संकेत भी देता है और क्षेत्र में आगामी कृषि चक्र की तैयारियों की शुरुआत को दर्शाता है। मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने उत्सव में भाग लेकर पारंपरिक अनुष्ठानों को देखा और लद्दाख की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए आयोजकों के प्रयासों की सराहना की। लेह फु-धो सांस्कृतिक एवं कल्याण समिति द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
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उत्सव के दूसरे दिन पारंपरिक ‘स्टोर्मा’ अनुष्ठान आयोजित किया जाएगा जो एक महत्वपूर्ण धार्मिक अर्पण है। माना जाता है कि यह क्षेत्र से नकारात्मकता और बुरी शक्तियों को दूर करता है। इस बीच लेह के पोलो ग्राउंड में आयोजित एक उत्सवी मेला भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहा। यहां स्थानीय लोगों और पर्यटकों ने खरीदारी, खाद्य स्टॉल और उत्सव के माहौल का आनंद लिया। लेह दोस्मोचे के साथ-साथ लिकिर मठ में स्ट्रोमोचे उत्सव भी मनाया जा रहा है, जिससे क्षेत्र की सांस्कृतिक जीवंतता और बढ़ गई है।
दोस्मोचे उत्सव लद्दाख की आध्यात्मिक पहचान का जीवंत प्रतीक बना हुआ है, जो परंपरा, सामुदायिक भागीदारी और समृद्ध भविष्य की प्रार्थनाओं को एक साथ जोड़ता है।