हमारी यह दूसरी पीढ़ी है जो इस कला के साथ जुडी हुई है। मैंने अपने बचपन से अपने पिता को देख कर यह कला सीखी है और मई भी करीब 30 वर्षों से अधिक समय से पेपर पाशी कला के साथ जुड़ा हुआ हूं। अभी मेरे बच्चे छोटे हैं लेकिन वह भी इस ओर आकर्षित हैं। अपनी आईटी इंजीनियरिंग को संपन्न करने के बाद मैंने इस कला को पेशेवर तरीके से अपनाया है। मैंने इस कला के उतार-चढ़ाव देखे हैं और इस कला को संरक्षित करने तथा इसमें योगदान देने के लिए मैंने स्वयं को इसके लिए समर्पित कर दिया है।
बता दें कि अर्शिद ने श्रीनगर के इस्लामिया कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद इग्नू से बीआईटीएस बीटेक और फिर लंदन से एचएनडीएंडएचएनसी (हायर नेशनल डिप्लोमा एंड हायर नेशनल सर्टिफिकेशन) की पढाई की है। उन्होंने कहा कि मुझे आज काफी खुशी हो रही है कि उनके कार्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरहाहा गया है। यह एक कारीगर के लिए काफी खुशी का पल होता है। हमारा यहां जो हेंडीक्राफ्ट विभाग है - प्रदेश का या सेंट्रल, काफी सहयोग दे रहे हैं लेकिन नीतियों में अच्छे बदलाव होने चाहिए ताकि शिल्प को अगली पीढ़ी के लिए संरक्षित किया जा सके। क्योंकि अगर देखा जाए अगली पीढ़ियों में जॉब फैसिलिटी ऐसी नहीं होगी।
गौरतलब है कि कारीगरों द्वारा कला से दूरी बनाने को लेकर पूछे जाने पर अगर नया मार्किट ढूंढा जाए, एक ब्रांडिंग सिस्टम के द्वारा इस कला को अंतरराष्ट्रीय मार्किट तक ले जाया जाए तो ज़ाहिर तौर पर कारीगर वापिस इस कला की ओर आकर्षित होंगे। क्योंकि आखिर कार सब रोजी रोटी कमाने के लिए करते हैं और अगर सबको वो मिल पाएगा तो कोई इस कला से दूरी क्यों बनाएगा।