श्रीनगर। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस विक्रम नाथ ने शुक्रवार को कहा कि कानूनी अधिकारों को महिलाओं के लिए सुलभ, समन्वित और गरिमापूर्ण संस्थागत मदद में बदलना होगा। वह एसकेआईसीसी, श्रीनगर में जम्मू-कश्मीर विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा आयोजित महिला सशक्तीकरण विषय पर मेगा जागरूकता कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।
जस्टिस नाथ ने कहा कि विधिक सेवा संस्थानों की प्रभावशीलता इसी से तय होगी कि संकट में फंसा व्यक्ति बिना डर के सिस्टम तक पहुंच सके। गरिमा के साथ सुना जाए और बिना देरी के सक्षम सहायता मिले। उन्होंने कहा कि सम्मेलन की कार्यवाही और अहम विचार-विमर्श को स्थानीय भाषाओं में अनुदित कर सभी हितधारकों तक पहुंचाया जाए ताकि जमीनी स्तर पर असर हो।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश और जम्मू-कश्मीर विधिक सेवा प्राधिकरण के पर्यवेक्षक न्यायाधीश जस्टिस एसवी एन भट्टी ने कहा कि महिलाओं और बच्चों को खंडित संस्थागत व्यवस्था में भटकने या अलग-अलग अधिकारियों के सामने बार-बार दर्दनाक अनुभव बताने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। स्पष्ट रेफरल मार्ग, गोपनीयता और जवाबदेही जरूरी है।
उच्च न्यायालय जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश और जम्मू-कश्मीर विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष जस्टिस संजीव कुमार ने कहा कि न्याय तक पहुंच सिर्फ कानून और संस्थानों की उपलब्धता से नहीं मापी जा सकती।
उन्होंने फ्रंट ऑफिस, कानूनी सहायता क्लीनिक, पैनल वकीलों और पैरा-लीगल वॉलंटियरों को मजबूत करने पर जोर दिया। इस मौके पर जस्टिस संजीव कुमार ने 2005 के भूकंप के बाद जम्मू-कश्मीर विधिक सेवा प्राधिकरण की भूमिका याद की। उन्होंने कहा कि तब न्यायिक अधिकारी पारंपरिक अदालतों से निकलकर प्रभावित इलाकों में खुले में लोक अदालतें लगाते थे, ताकि पीड़ितों को मौके पर मुआवजा और दावा निपटान मिल सके।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी के अध्यक्ष जस्टिस संजय धर ने कहा कि कानून में अधिकार की पहचान सिर्फ शुरुआत है। असली परीक्षा यह है कि अधिकार समझा, अपनाया और लागू किया जा सके। किसी महिला को पहली संस्था कैसे रिसीव करती है, उसी से न्याय व्यवस्था का सांविधानिक चरित्र झलकता है।
कार्यक्रम में एंडेवर-2025 वार्षिक न्यूजलेटर-कम-कंपेंडियम जारी किया गया। कश्मीर संभाग की जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के लिए बहु-उपयोगी वाहन भी रवाना किए गए ताकि दूरदराज इलाकों में मोबाइल कानूनी सेवाएं पहुंचाई जा सकें। पहला सत्र महिला अधिकार, कानूनी सशक्तीकरण और न्याय तक पहुंच विषय पर था। इसमें कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकथाम अधिनियम-2013, पॉक्सो अधिनियम-2012 और एमटीपी अधिनियम-1971 पर चर्चा हुई।
दूसरा सत्र संकटग्रस्त महिलाओं के लिए संस्थागत सहायता और अभिसरण तंत्र पर केंद्रित रहा। इसमें साइबर स्टॉकिंग, इमेज के दुरुपयोग और ऑनलाइन ब्लैकमेल जैसे मुद्दों पर बात हुई। कार्यक्रम में जस्टिस सिंधु शर्मा, जस्टिस राजनेश ओसवाल, जस्टिस मो. अकरम चौधरी, जस्टिस राहुल भारती, जस्टिस मोक्ष खजूरिया काजमी, जस्टिस वसीम सादिक नरगल, जस्टिस राजेश सेखरी, जस्टिस मो. यूसुफ वानी, जस्टिस संजय परिहार और जस्टिस शहजाद अजीम मौजूद रहे।