श्रीनगर। मीरवाइज-ए-कश्मीर डॉ. मौलवी मुहम्मद उमर फारूक ने कहा कि मस्जिदें, खानकाहें और इमामबाड़े सिर्फ इबादत की जगह नहीं हैं। ये हमेशा से सुधार, तालीम, रहनुमाई और सामाजिक बदलाव के बड़े केंद्र रहे हैं।
अमीरा कदल के सराय बाला में इदारा औकाफ गौसिया की ओर से आयोजित सीरत कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए मीरवाइज ने कहा कि इस्लामी तारीख में इन संस्थाओं ने नैतिक चेतना बनाने, आपसी भाईचारा मजबूत करने और समाज की अखलाकी चुनौतियों का हल निकालने में अहम रोल निभाया है। आज जब समाज राजनीतिक, नैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियों से जूझ रहा है तो इन इबादतगाहों के असली किरदार को फिर से जिंदा करना जरूरी है।
मीरवाइज ने कहा कि नैतिक गिरावट, घरेलू विवाद, बढ़ता भौतिकवाद और परिवार व समाज के रिश्तों का कमजोर होना बड़ी चिंता है। इसके लिए सामूहिक आत्मचिंतन और सामाजिक जुड़ाव चाहिए।
उन्होंने कहा कि हमारी मस्जिदों, खानकाहों और इमामबाड़ों को समाज में सकारात्मक बदलाव की पहल करनी होगी। उन्होंने कहा कि इन्हें नई नस्ल की रहनुमाई करनी है, जागरूकता फैलानी है, नैतिक मूल्यों को मजबूत करना है और लोगों की समस्याओं का हल निकालना है।