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Srinagar News: हाईकोर्ट ने रिटायर्ड पॉलिटेक्निक प्रिंसिपल को रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले लाभ देने के कैट के आदेश को सही ठहराया

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संवाद न्यूज एजेंसी
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श्रीनगर। जम्मू कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक कॉलेज पुलवामा के रिटायर्ड प्रिंसिपल को पेंशन और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले अन्य लाभ देने का निर्देश दिया गया था।

एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव कुमार और जस्टिस मोहम्मद यूसुफ वानी की डिवीजन बेंच ने फिरदौस अहमद इत्तू के पक्ष में कैट के 30 मार्च के आदेश को बरकरार रखा। इत्तू 30 अप्रैल 2024 को रिटायर हुए थे। ट्रिब्यूनल ने सरकार को निर्देश दिया था कि वह उनकी पेंशन और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले लाभों की प्रक्रिया पूरी करे और उन्हें जारी करें, साथ ही और देरी होने पर 6 प्रतिशत सालाना ब्याज भी दे।
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सरकार ने इत्तू की पूरी पेंशन और ग्रेच्युटी रोक दी थी। सरकार का तर्क था कि क्राइम ब्रांच की ओर से दर्ज एफआईआर में उनका नाम एक संदिग्ध के तौर पर सामने आया था और इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईयूएसटी) में कथित गबन के मामले की जांच पर विचार किया जा रहा था। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने पाया कि रिटायर्ड अधिकारी के खिलाफ कोई न्यायिक कार्यवाही या विभागीय जांच लंबित नहीं थी और कहा कि उन्हें रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले पूरे लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।
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ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों की पुष्टि करते हुए डिवीजन बेंच ने कहा कि पेंशन और ग्रेच्युटी संविधान के अनुच्छेद 300ए के तहत संरक्षित संवैधानिक संपत्ति के अधिकार हैं और कानूनी प्रावधानों के अनुसार ही इन्हें रोका जा सकता है। बेंच ने गुलाम मोहि-उद-दीन लोन बनाम राज्य मामले में अपने पहले के फैसले और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केवी जानकीरमन मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। इन फैसलों में कहा गया था कि प्रोविजनल पेंशन तभी मंजूर की जा सकती है, जब रिटायरमेंट से पहले वैध विभागीय या न्यायिक कार्यवाही शुरू की गई हो।
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