उधमपुर। चिनैनी की मुंसिफ अदालत ने एक मामले की सुनवाई करते हुए साफ किया है कि कानून में समय सीमा का पालन करना बेहद जरूरी है। कोर्ट ने मामले में बहुत ज्यादा देरी करने और सही बातें छिपाने की वजह से मुकदमा करने वाले की याचिका को खारिज कर दिया। वादी चाहता था कि जिस पर मुकदमा था, मौत के बाद उसके कानूनी वारिसों को केस में शामिल करके मुकदमा फिर से शुरू किया जाए।
कुद के रहने व्यक्ति ने सुकेतर के व्यक्ति पर एक दीवानी मुकदमा किया था। केस चलने के दौरान ही जिया लाल की मौत हो गई। कानून के मुताबिक अगर किसी प्रतिवादी की मौत हो जाती है, तो 90 दिनों के भीतर उसके वारिसों के नाम कोर्ट के रिकॉर्ड में दर्ज कराने के लिए अर्जी देनी होती है। ऐसा न करने पर मुकदमा अपने आप खत्म मान लिया जाता है।
वादी ने काफी समय बीत जाने के बाद कोर्ट में अर्जी दी और कहा कि वह पुलिस ट्रेनिंग और नौकरी के सिलसिले में बाहर था, इसलिए उसे मौत की खबर दो महीने पहले ही मिली। दूसरी तरफ, विपक्ष ने कोर्ट में मृतक का सरकारी मृत्यु प्रमाण पत्र पेश किया। इसके अलावा यह बात भी सामने आई कि मुकदमा करने वाला वादी असल में मृतक का चचेरा भाई है और वह उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल हुआ था। अदालत ने पाया कि वादी ने न केवल कोर्ट से सच छिपाया, बल्कि बाहर रहने की बात का भी कोई पक्का सबूत पेश नहीं किया। न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि समय सीमा का कानून इसलिए बनाया गया है ताकि मुकदमों का फैसला वक्त पर हो सके। लापरवाही या झूठे बहानों पर कोर्ट किसी को छूट नहीं दे सकता। अदालत ने माना कि तय समय निकलने के बाद यह मुकदमा कानूनी रूप से खत्म हो चुका था और इसे दोबारा शुरू करने की कोई ठोस वजह नहीं है। इसी के साथ कोर्ट ने वादी की सभी अर्जियां खारिज कर दीं।