श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने पर सख्त रुख अपनाते हुए कुछ याचिकाकर्ताओं पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि जरूरी तथ्यों को दबाना कोर्ट के साथ धोखाधड़ी के समान है।
यह आदेश जस्टिस वसीम सादिक नरगल की पीठ ने दिया। गुलाम मुहम्मद शेख और दो अन्य लोगों ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत जो याचिका दायर की थी, उसमें याचिकाकर्ताओं ने स्पेशल मोबाइल मजिस्ट्रेट बडगाम के 24 मार्च, 2026 के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश में तहसीलदार, बडगाम को 4 जून, 2025 के आदेश को लागू करने का निर्देश दिया गया था इसके अलावा याचिकाकर्ताओं ने कुछ और राहतें भी मांगी थीं।
कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं ने पहले ही स्पेशल मोबाइल मजिस्ट्रेट, बडगाम के पास एक अर्जी दायर करके 24 मार्च, 2026 के आदेश को निलंबित करने की मांग की थी। ट्रायल कोर्ट ने दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद 6 अप्रैल, 2026 को पहले ही एक आदेश पारित कर दिया था जिसके तहत विवादित आदेश के अमल और निष्पादन पर पहले ही रोक लगा दी गई थी।
कोर्ट ने कहा, इस याचिका में जो शिकायत उठाई गई है, उसका समाधान सक्षम कोर्ट द्वारा पहले ही किया जा चुका है। अदालत ने पाया कि यह याचिका क़ानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग थी, पूरी तरह से गलत धारणा पर आधारित थी और इसमें कोई भी दम नहीं था। इसलिए, अदालत ने इसे खारिज कर दिया और याचिकाकर्ताओं पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया, जिसे याचिकाकर्ताओं को दो हफ्तों के भीतर अदालत की रजिस्ट्री में जमा करना होगा।