श्रीनगर। केंद्र सरकार की अलगाववादियों और आतंकवादियों के खिलाफ नीति स्पष्ट और मजबूत है। यह बात कश्मीर घाटी में महिला अलगाववादी संगठन दुख्तरान ए मिल्लत (डीईएम) की अध्यक्ष आसिया अंद्राबी को अपनी अन्य दो साथियों के साथ मिली आजीवन कारावास से फिर स्पष्ट हो गई है। अंद्राबी पहली ऐसी अलगाववादी नेता नहीं है, जिसे ऐसी सजा सुनाई गई हो।
केंद्र ने 5 अगस्त, 2019 से अलगाववादियों और आतंकवादियों के खिलाफ एक ठोस नीति अपनाई है और उनके खेमों पर लगातार कार्रवाई जारी रखी है। यही कारण है कि 2019 के बाद से लगभग सभी बड़े अलगाववादी नेता दिल्ली या अन्य बाहरी जेलों में बंद हैं। पिछले साल कई ऐसे नेता भी सामने आए जिन्होंने सार्वजनिक तौर पर अलगाववादी खेमों से अपने रिश्ते तोड़ने की घोषणा की और स्पष्ट किया कि उनका उन अलगाववादी संगठनों की विचारधारा के साथ कोई लेनदेन नहीं है जोकि केंद्र की ठोस नीति का नतीजा है।
राजनीतिक विशेषज्ञ इनायत अहमद के अनुसार आसिया अंद्राबी कश्मीर घाटी में इस्लामिक विचारधारा, अलगाववाद और आतंकवाद का समर्थन देने में काफी अहम भूमिका निभाती आई थी। अंद्राबी ने मार्च 1987 में पोर्नोग्राफिक फिल्मों के खिलाफ उस समय मोर्चा संभाला था जब श्रीनगर में विदेशी फिल्में दिखाई जा रही थीं। दुख्तरान-ए-मिल्लत का कैडर अपने बुर्के के नीचे ब्रश और पेंट के डिब्बे लेकर चलता थे और आपत्तिजनक पोस्टर और तस्वीरों पर पेंट करता था। उसने कश्मीर घाटी में ब्यूटी पार्लरों के खिलाफ भी अभियान चलाया।
इतना ही नहीं 1989 में आतंकवाद की शुरुआत के साथ उन्होंने कश्मीर में बुर्के न पहनने को लेकर कश्मीरी औरतों का विरोध किया। मई 1993 में उसने औरतों ने औरतों को बिना बुर्का के बाहर न निकलने की चेतावनी दी। उसने कश्मीर घाटी में ब्यूटी पार्लरों के खिलाफ भी अभियान चलाया। साल 1990 से लेकर 2018 तक कश्मीर में रेस्तरां, होटल मालिक नववर्ष हो या वैलेंटाइन डे-कोई समारोह आयोजित करने से बचते थे। कई बार वह स्वयं या फिर उसकी कार्यकर्ता रेस्तरां और पार्कों में घुसकर वहां घूम रहे युवा जोड़ों को प्रताड़ित करते थे। कई बार उसने बुर्का न पहनने वाली लड़कियों के चेहरों पर स्याही भी फेंकी।
आसिया अंद्राबी कश्मीर में कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा और शरियत को लागू करने की समर्थक थी। केंद्र सरकार ने ऐसे सभी अलगाववादी नेताओं और उनके संगठनों पर शिकंजा कसा जो देश का विद्रोह करते थे और जहर उगलते थे। और यही नतीजा है कि कश्मीर घाटी में आज अलगावाद और आतंकवाद का काफी हद तक खात्मा हो चुका है और जो कोई बचे भी थे उन्होंने भी हाल के दिनों में इन संगठनों से किनारा किया है।
सेवानिवृत्त डीजीपी एसपी वैद कहते हैं कि देशद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई होनी ही चाहिए। इससे अलगावादियों का तंत्र कमजोर पड़ेगा और प्रगतिशील लोगों खासकर महिलाओं को एक सुरक्षित माहौल मिलेगा।विशेषज्ञों का मानना है कि अलगाववादी खेमे में बदलाव दो कारणों की वजह से देखने को मिल रहा है एक सुरक्षाबलों द्वारा गैर संवैधानिक गतिविधियों का समर्थन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई और दूसरा लोगों की मानसिकता में बदलाव।