श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने पीएसए के तहत पुलवामा के 18 साल के एक युवक की निवारक हिरासत को सही ठहराया है। कोर्ट ने इसके पीछे 2021 में कृष्णा ढाबा के मालिक आकाश मेहरा की हत्या में उसकी कथित संलिप्तता और आतंकवादियों से उसके संबंधों का हवाला दिया है।
जस्टिस राहुल भारती की बेंच ने युवक के पिता की तरफ से दायर एक याचिका को खारिज कर दिया। इस याचिका में युवक ने 30 अप्रैल 2025 को पुलवामा के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट द्वारा जारी अपनी हिरासत के आदेश को चुनौती दी थी। हिरासत के आधार के अनुसार पुलिस ने आरोप लगाया था कि युवक ने फेसबुक और व्हाट्सएप के जरिए शकील अहमद उर्फ गाजी नाम के एक व्यक्ति से संपर्क साधा था। साथ ही वह 17 फरवरी 2021 को श्रीनगर के कृष्णा ढाबा पर हुए हमले की योजना बनाने में भी शामिल था। इस हमले में ढाबा मालिक आकाश मेहरा बाद में अपनी चोटों के कारण चल बसे थे।
इस मामले में राम मुंशी बाग पुलिस स्टेशन में आईपीसी, आर्म्स एक्ट और गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत एक एफआईआर दर्ज की गई थी। कोर्ट ने यह भी पाया कि युवक हालांकि कथित अपराध के समय नाबालिग था, बाद में उसे जुवेनाइल होम से रिहा कर दिया गया था। आरोप है कि उसने आतंकवादियों रियाज अहमद डार उर्फ खालिद उर्फ शीराज और रईस अहमद डार के लिए एक ओवरग्राउंड वर्कर के तौर पर काम करना जारी रखा।
युवक ने दलील दी कि उसकी हिरासत केवल 2021 की एक अकेली एफआईआर पर आधारित थी। इसके लिए कोई नए आधार नहीं थे और यह उसके सांविधानिक अधिकारों का उल्लंघन था क्योंकि उसे कथित तौर पर संबंधित दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए थे। उसने 2 लाख रुपये के मुआवजे की भी मांग की थी।हालांकि हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि युवक पर लगाए गए कथित आरोप ऐसे अपराधों से जुड़े हैं जो राज्य की सुरक्षा को प्रभावित करते हैं। इसलिए केवल उसकी कम उम्र के आधार पर इन मामलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की उम्र, जो कि 18 साल बताई गई है, उसे नरमी बरतने का आधार नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने आगे कहा कि उसकी कथित गतिविधियां ''''जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश की सुरक्षा के लिए एक संभावित खतरा'''' पैदा करती हैं।कोर्ट ने यह भी पाया कि अपनी हिरासत के खिलाफ दिए गए अभ्यावेदन में युवक ने उस डोजियर में नामित आतंकवादियों के साथ अपने जुड़ाव से इनकार नहीं किया था। यह मानते हुए कि निवारक हिरासत के आधारों में कोई कमी नहीं थी, कोर्ट ने याचिका को सारहीन पाया और उसे खारिज कर दिया।