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Srinagar News: अनियंत्रित पर्यटन और जलवायु परिवर्तन बना लद्दाख के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बड़ा संकट

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श्रीनगर। बुनियादी ढांचे के अनियोजित विस्तार, लगातार बढ़ती पर्यटकों की संख्या, प्राकृतिक आवासों में बदलाव, जलवायु परिवर्तन, गैर-देशी पौधरोपण और आवारा कुत्तों के बढ़ते खतरे ने लद्दाख के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र और वहां की समृद्ध पक्षी विविधता को बेहद गंभीर संकट में डाल दिया है।
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नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष प्रस्तुत एक विस्तृत वैज्ञानिक मूल्यांकन रिपोर्ट में यह चिंताजनक खुलासा हुआ है। यह रिपोर्ट ''''सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री'''' (एसएसीओएन) और ''''भारतीय वन्यजीव संस्थान'''' द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई है, जिसे ट्रिब्यूनल की प्रधान पीठ के समक्ष पेश किया गया।
वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार लद्दाख में अब तक पक्षियों की कुल 464 प्रजातियां दर्ज की जा चुकी हैं, जिनमें से 197 प्रजातियां यहां प्रजनन करती हैं। इनमें 87 ऐसी मूल प्रजातियां शामिल हैं जो वर्ष भर लद्दाख के उच्च हिमालीय वातावरण में ही रहती हैं। ट्रांस-हिमालयी जैविक क्षेत्र में स्थित होने के कारण लद्दाख की विषम जलवायु, अत्यधिक ऊंचाई और सीमित संसाधन इसे अत्यंत नाजुक बनाते हैं। मध्य एशिया और उत्तरी तिब्बती पठार से आने वाली लगभग 50 प्रवासी प्रजातियों के लिए यह क्षेत्र एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यहां तिब्बती स्नोकॉक, तिब्बती तीतर, तिब्बती सैंडग्राउस, हिमालयन स्नोकॉक, व्हाइट-ब्रोव्ड टिट-वाबलर, ब्राउन एक्सेंटर और तिब्बती ग्रे-बैक श्रीक जैसी विशिष्ट प्रजातियां पाई जाती हैं।
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रिपोर्ट में लद्दाख की 65 पक्षी प्रजातियों को ''''उच्च संरक्षण चिंता'''' की श्रेणी में रखा गया है। इनमें येलो-ब्रेस्टेड बुशचैट, मिस्र का गिद्ध, स्टेपी ईगल, पालास फिश-ईगल, सेकर फाल्कन, कॉमन क्रेन और ब्लैक-नेक्ड क्रेन जैसी दुर्लभ प्रजातियां शामिल हैं। लद्दाख का प्रतीक माने जाने वाले ''''ब्लैक-नेक्ड क्रेन'''' के लिए यह क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण प्रजनन स्थल है, जो विशिष्ट उच्च-ऊंचाई वाली आर्द्रभूमि और घास के मैदानों पर निर्भर करता है। मानवीय गतिविधियों के कारण इसके प्रजनन स्थलों पर खतरा मंडरा रहा है।
विकास परियोजनाओं और सड़कों के अनियोजित निर्माण ने भी पक्षियों के आवासों को विखंडित किया है। पूगा हॉट स्प्रिंग में प्रस्तावित भू-तापीय परियोजना इसका बड़ा उदाहरण है, जो पक्षियों के एक महत्वपूर्ण आवास क्षेत्र में स्थित है। इसके साथ ही, लद्दाख में पर्यटकों की संख्या वर्ष 2017 के 2.5 लाख से बढ़कर वर्ष 2024 तक लगभग 5.25 लाख पहुंच चुकी है, जिससे अनियंत्रित कचरा, वाहनों की आवाजाही और प्राकृतिक अशांति बढ़ रही है।
अन्य खतरों में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या शामिल है, जो जमीन पर घोंसला बनाने वाले पक्षियों जैसे हिमालयन स्नोकॉक और चकोर के अंडों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वहीं बंजर पहाड़ियों वाले लद्दाख में पॉपलर और पिलखन जैसे विदेशी पौधे लगाने से स्थानीय पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों का पिघलना और बर्फबारी के ढर्रे में बदलाव भी पक्षियों के भोजन चक्र को प्रभावित कर रहा है।
अध्ययन के अंत में स्पष्ट किया गया है कि यद्यपि लद्दाख में हेमिस नेशनल पार्क, चांगथांग और काराकोरम जैसे वन्यजीव अभयारण्य मौजूद हैं, लेकिन केवल इन्हें संरक्षित घोषित कर देना ही काफी नहीं है। लद्दाख की अनूठी पक्षी विविधता को बचाने के लिए विकास और पर्यटन गतिविधियों को सख्त नियमों के तहत लाने और लगातार वैज्ञानिक निगरानी बनाए रखने की तत्काल आवश्यकता है।
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