श्रीनगर। कश्मीर के प्रमुख और पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील पर्यटन स्थल पहलगाम का प्राकृतिक सौंदर्य और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र एक बार फिर विवादों के घेरे में है। संरक्षित वन्यजीव और वन क्षेत्रों के भीतर और उनके आसपास हो रहे अवैध निर्माण कार्यों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सूत्रों का आरोप है कि मामल इलाके के पास पुरानी हटों की ''''मरम्मत'''' के नाम पर बड़े पैमाने पर नए ढांचे खड़े कर दिए गए हैं।
खबरों का कड़ा संज्ञान लेते हुए वन विभाग ने तुरंत प्रभाव से चल रहे निर्माण कार्य को रुकवा दिया है। संभागीय वन अधिकारी (डीएफओ) सज्जाद अहमद ने विभाग की कार्रवाई की पुष्टि करते हुए स्पष्ट किया कि मामले की गहन जांच जारी है और अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी गई है। उन्होंने बताया कि हमने काम रोकने के निर्देश दिए हैं और मैंने यह विस्तृत रिपोर्ट मांगी है कि आखिर इस संवेदनशील क्षेत्र में यह निर्माण कार्य शुरू कैसे हुआ। उन्होंने आगे कहा कि विभाग को कुछ शिकायतें मिली थीं, जिस पर कार्रवाई करते हुए निर्देश दिए गए हैं।
पहलगाम को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे के तहत वन और वन्यजीव क्षेत्रों में नए निर्माण पर सख्त पाबंदी है। जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने पूर्व में स्पष्ट आदेश दिए थे कि इन क्षेत्रों में केवल पुराने ढांचों को बने रहने दिया जा सकता है, लेकिन कोई भी नया निर्माण या विस्तार नहीं होगा। जीर्णोद्धार का काम भी केवल मास्टर प्लान और निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही संभव है। आरोप हैं कि प्रभावशाली लोगों ने मरम्मत की आड़ लेकर पुरानी हटों के दायरे से कहीं बड़े अवैध ढांचे खड़े कर लिए हैं।
मामल क्षेत्र में अतिक्रमण और अवैध कब्जों का पुराना इतिहास रहा है। नवंबर 2020 में पहलगाम विकास प्राधिकरण (पीडीए), वन्यजीव, वन और राजस्व विभाग ने संयुक्त अभियान चलाकर मामल में करीब 110 कनाल वन भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया था। उस दौरान कई अवैध हटों, ढोक (अस्थायी ढांचों) और बाड़बंदी को ढहा दिया गया था।
स्थानीय निवासियों और पर्यावरणविदों ने निर्माण के दौरान सदियों पुराने देवदार के पेड़ों की कथित कटाई पर भी गहरी चिंता जताई है। विशेषज्ञों के अनुसार, वयस्क देवदार के पेड़ों की कटाई से होने वाले नुकसान की भरपाई नए पौधे लगाकर नहीं की जा सकती। पहलगाम के वन, ढलान और नदियां पूरे क्षेत्र को प्राकृतिक आपदाओं से बचाते हैं। हाल ही में नेपाल और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में आई भीषण बाढ़ ने यह साबित कर दिया है कि संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में अनियोजित विकास कितना घातक हो सकता है।