संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जिले की एक अदालत ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला को पासपोर्ट जारी करने के लिए नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट दे दिया है। अदालत ने कहा कि आपराधिक कार्यवाही लंबित होने का मतलब यह नहीं है कि कोई नागरिक पासपोर्ट नहीं ले सकता।
श्रीनगर की अतिरिक्त सत्र अदालत के जज फारूक अहमद भट ने यह आदेश वरिष्ठ अब्दुल्ला की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। अब्दुल्ला पर जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन फंड के गबन के मामले में मुकदमा चल रहा है, जिसकी जांच सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन कर रही है।
फारूक ने अदालत को बताया था कि वर्ष 2012 की एफआईआर से जुड़ी पुलिस वेरिफिकेशन रिपोर्ट नकारात्मक आने के बाद, श्रीनगर के रीजनल पासपोर्ट ऑफिस ने सक्षम अदालत से बरी होने का आदेश या एनओसी मांगी थी।
सीबीआई ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आपराधिक कार्यवाही अभी भी लंबित है और आरोप तय करने के आदेश पर रिविजनल कोर्ट द्वारा लगाई गई अंतरिम रोक का मतलब मुकदमा रद्द होना नहीं है। एजेंसी ने यह भी तर्क दिया कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए आशंका है कि पासपोर्ट मिलने पर अब्दुल्ला देश छोड़कर जा सकते हैं।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद, अदालत ने कहा कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 6(2)(एफ) और अधिनियम की धारा 22 के तहत जारी केंद्र सरकार की अधिसूचनाओं के अनुसार, आपराधिक कार्यवाही का सामना कर रहे व्यक्ति को पासपोर्ट जारी करने या उसे रिन्यू करने की अनुमति दी जा सकती है, अगर सक्षम अदालत इसकी मंजूरी दे।
अदालत ने महेश कुमार अग्रवाल बनाम भारत संघ और अन्य (2025) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया। इस फैसले में कहा गया था कि विदेश यात्रा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हिस्सा ह। आपराधिक मामला लंबित होने का मतलब पासपोर्ट जारी करने या रिन्यू करने पर पूरी तरह रोक नहीं है। सिर्फ इसलिए कि आपराधिक कार्यवाही चल रही है, कानूनी व्यवस्था पासपोर्ट जारी करने पर पूरी तरह रोक नहीं लगाती है। बल्कि, यह आपराधिक कोर्ट की निगरानी वाली भूमिका को मानती है, जो व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार और मुकदमे के दौरान उसकी मौजूदगी सुनिश्चित करने की जरूरत के बीच संतुलन बनाती है।
कोर्ट ने साफ किया कि पासपोर्ट जारी करना विदेश यात्रा की अनुमति से अलग है और पासपोर्ट मिलने का मतलब यह नहीं है कि न्यायिक प्रतिबंधों का उल्लंघन करके विदेश यात्रा की जा सकती है। कोर्ट ने आगे निर्देश दिया कि अगर डॉ. अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर से बाहर या विदेश यात्रा करना चाहते हैं, तो उन्हें श्रीनगर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट से पहले अनुमति लेनी होगी।
अगर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या रिविजनल कोर्ट का कोई बाद का आदेश अब्दुल्ला के खिलाफ होता है, तो कोर्ट द्वारा जारी एनओसी अपने आप रद्द हो जाएगी। आदेश को पालन के लिए श्रीनगर के पासपोर्ट अधिकारी को भेज दिया गया है।