अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। कश्मीर यूनिवर्सिटी के बॉटनी डिपार्टमेंट ने सोमवार को बदलती जलवायु में पौधों की सहनशक्ति : मॉलिक्यूल्स से इकोसिस्टम तक विषय पर दो दिन की इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस शुरू की। इसमें वैज्ञानिक, एकेडमिक्स, रिसर्चर और युवा स्कॉलर शामिल हुए ताकि जलवायु परिवर्तन से पौधों, खेती और प्राकृतिक इकोसिस्टम (खासकर हिमालय जैसे नाजुक इलाकों) के सामने आ रही चुनौतियों पर चर्चा की जा सके।
केयू के बॉटनी डिपार्टमेंट द्वारा आयोजित इस कॉन्फ्रेंस में अमेरिका की पेन स्टेट यूनिवर्सिटी का एकेडमिक सहयोग मिला है। इसे भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की स्कीम फॉर प्रमोशन ऑफ एकेडमिक एंड रिसर्च कोलैबोरेशन के तहत स्पॉन्सर किया गया है और एएनआरएफ, डीबीटी-भारत सरकार ने भी इसमें सहयोग दिया है।
इस कॉन्फ्रेंस का मकसद वैज्ञानिक और एकेडमिक सहयोग को मजबूत करना और बदलती जलवायु परिस्थितियों में पौधों की सहनशक्ति पर ज्ञान और नई रिसर्च के आदान-प्रदान के लिए एक मंच प्रदान करना है।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए, केयू की वाइस-चांसलर प्रो. निलोफर खान ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर दुनिया भर में साफ दिख रहा है।
इसके लिए वैज्ञानिक और सामाजिक स्तर पर ठोस प्रयासों की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी और रिसर्च संस्थानों की यह अहम जिम्मेदारी है कि वे ऐसा ज्ञान पैदा करें जो समुदायों और इकोसिस्टम को तेजी से बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल ढलने में मदद कर सके।
हिमालयी क्षेत्र अपनी पारिस्थितिक संवेदनशीलता के कारण जलवायु परिवर्तन के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है, इसलिए पौधों की सहनशक्ति और इकोसिस्टम की स्थिरता पर केंद्रित रिसर्च बहुत महत्वपूर्ण है।
वैज्ञानिक ज्ञान को प्रभावी उपायों में बदलने की जरूरत है - जैसे बीज सुधार और सही तरीके से पौधों की खेती से लेकर व्यापक टिकाऊ तौर-तरीकों तक - साथ ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिसर्च सहयोग को भी मजबूत करना होगा।
अपने विशेष संबोधन में केयू के डीन (रिसर्च) प्रो. बशीर अहमद गनई ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर प्राकृतिक पर्यावरण से कहीं आगे तक जाता है और इसे व्यापक सामाजिक और विकासात्मक संदर्भ में समझने की जरूरत है।
उन्होंने प्राकृतिक प्रणालियों में बदलाव और पर्यावरणीय विविधताओं की गहन वैज्ञानिक रिसर्च के जरिए जांच करने के महत्व पर जोर दिया ताकि उनके परिणामों की व्यापक समझ विकसित की जा सके।