संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने 57.20 किलोग्राम गांजा बरामदगी के मामले में आरोपी की जमानत रद्द कर दी है। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत जमानत की अनिवार्य और सख्त शर्तों का पालन करने में विफल रही।
न्यायमूर्ति संजय परिहार की पीठ ने आरोपी नजीर अहमद मीर के खिलाफ दायर याचिका पर यह फैसला सुनाया। यह मामला वर्ष 2024 में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार 16 अक्तूबर 2024 को पुलवामा जिले के चकूरा गांव स्थित आयुष्मान हेल्थ सेंटर के पास आरोपी को गांजे से भरी बोरियों पर बैठे हुए पकड़ा गया था। बरामद मादक पदार्थ का वजन 57.20 किलोग्राम था, जो कि व्यावसायिक मात्रा (कमर्शियल क्वांटिटी) की श्रेणी में आता है।
ट्रायल कोर्ट ने एक नवंबर 2025 को आरोपी को गवाहों के बयानों में बरामदगी, जब्ती और प्रक्रियात्मक नियमों के पालन को लेकर विरोधाभास के आधार पर जमानत दे दी थी। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यह निर्णय एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 की वैधानिक अनिवार्यताओं को पूरा नहीं करता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब मामला व्यावसायिक मात्रा से जुड़ा हो और अभियोजन पक्ष जमानत का विरोध करे, तो अदालत को दोहरी संतुष्टि दर्ज करनी होती है। न्यायमूर्ति परिहार ने टिप्पणी की कि यह संतुष्टि केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक अनिवार्य वैधानिक और क्षेत्राधिकार से जुड़ी शर्त है। गवाहों के बयानों में मामूली विसंगतियां धारा 37 के सख्त मानकों को स्वतः समाप्त नहीं कर सकतीं।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि मामले में 11 में से 7 गवाहों के बयान पहले ही दर्ज हो चुके थे और मुकदमे में कोई अनुचित या बेवजह देरी नहीं हुई थी। आरोपी की इस दलील को भी खारिज कर दिया गया कि उसने जमानत की शर्तों का उल्लंघन नहीं किया। अदालत ने कहा कि यदि मूल जमानत आदेश ही वैधानिक रोक के विपरीत हो, तो बाद का अच्छा आचरण उस बुनियादी कानूनी खामी को ठीक नहीं कर सकता। जम्मू-कश्मीर प्रशासन की याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का जमानत आदेश रद्द कर दिया।
अदालत ने आरोपी नजीर अहमद मीर को ट्रायल कोर्ट के समक्ष तत्काल आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने का निर्देश दिया है। ऐसा न करने पर अदालत को आरोपी को हिरासत में लेने के लिए दंडात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही, ट्रायल कोर्ट को मुकदमे की सुनवाई तेजी से पूरी करने को कहा गया है।