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चिंताजनक: जम्मू-कश्मीर में जनवरी से अब तक सामान्य से 42 फीसदी कम बारिश हुई, सूखे का जोखिम भी बढ़ा

Tue, 09 Jun 2026 11:06 PM IST
Akash Dubey अमर उजाला ब्यूरो, श्रीनगर

सार

मई 2026 में सामान्य से 36 फीसदी कम बारिश हुई। जनवरी से मई तक कुल बारिश में 42 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। नवंबर 2025 से यह ट्रेंड जारी है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सांकेतिक तस्वीर
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विस्तार
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जम्मू-कश्मीर में मई 2026 के दौरान सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। केंद्र शासित प्रदेश में सामान्य 77.5 मिमी के मुकाबले 49.4 मिमी बारिश हुई। इससे 36 फीसदी की कमी रही। इन नए आंकड़ों के साथ जनवरी-मई की कुल बारिश में कमी बढ़कर 42 फीसदी हो गई है जो साल के शुरुआती पांच महीनों में पूरे क्षेत्र में सामान्य से कम बारिश के दौर को दिखाता है।

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मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, मासिक बारिश में जनवरी में -23 फीसदी, फरवरी में -89 फीसदी, मार्च में -34 फीसदी, अप्रैल में -13 फीसदी और मई में -36 फीसदी की कमी रही। इस तरह जनवरी-मई की अवधि में कुल मिलाकर 42 फीसदी की कमी रही। यह डेटा कम बारिश के लंबे ट्रेंड को भी दिखाता है। नवंबर 2025 से जम्मू-कश्मीर में हर महीने सामान्य से कम बारिश और बर्फबारी दर्ज की गई है।

कश्मीर डिवीजन के जिलों में शोपियां में सबसे ज़्यादा -83 फीसदी की कमी दर्ज की गई, जहां सामान्य 78.2 मिमी के मुकाबले 13.5 मिमी बारिश हुई। बडगाम और कुलगाम दोनों में -69 फीसदी की कमी दर्ज की गई जबकि अनंतनाग (-56%), पुलवामा (-42%), श्रीनगर (-43%), बांदीपोरा (-39%) और बारामुला (-14%) में भी बारिश सामान्य से कम रही।

गांदरबल में सामान्य के करीब एक फीसदी ज़्यादा बारिश दर्ज की गई (सामान्य 91.3 मिमी के मुकाबले 92.1 मिमी), जबकि कुपवाड़ा में सामान्य 103.1 मिमी के मुकाबले 103.5 मिमी बारिश हुई, जिससे महीने का अंत सामान्य स्तर के करीब रहा।

जम्मू संभाग में सबसे कम रामबन में 
जम्मू डिवीजन में रामबन (-65%), किश्तवाड़ (-57%), कठुआ (-56%), जम्मू (-55%) और रियासी (-53%) में बारिश की भारी कमी दर्ज की गई। राजोरी (-20%), डोडा (-17%), सांबा (-33%) और उधमपुर (-33%) में भी बारिश सामान्य से कम रही। पुंछ एकमात्र ऐसा जिला था जहां सामान्य बारिश (82.3 मिमी) के मुकाबले 122.8 मिमी बारिश हुई, यानी 49 फीसदी ज्यादा बारिश दर्ज की गई। कुल मिलाकर मई के दौरान जम्मू-कश्मीर में बारिश में 36 फीसदी की कमी दर्ज की गई। वहीं लद्दाख के कारगिल में सामान्य बारिश (6.3 मिमी) के मुकाबले 3.9 मिमी बारिश हुई, जिससे 38 फीसदी की कमी दर्ज की गई, जबकि लेह में सामान्य बारिश (1.5 मिमी) के मुकाबले 2.1 मिमी बारिश हुई, यानी 40 फीसदी ज्यादा बारिश हुई। कुल मिलाकर मई के अंत तक लद्दाख में बारिश में 7 फीसदी की कमी रही।

बारिश की बढ़ती कमी के असर
जैसे-जैसे जम्मू-कश्मीर गर्म मौसम की ओर बढ़ रहा है, बारिश की लगातार कमी एक अहम मुद्दा बनती जा रही है। केंद्र शासित प्रदेश में जनवरी-मई 2026 के दौरान बारिश में 42 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। नवंबर 2025 के बाद से हर महीने सामान्य से कम बारिश हुई है। चिंता सिर्फ़ एक मौसम तक सीमित नहीं है। पिछले कई सर्दियों के मौसम में जम्मू-कश्मीर में आम तौर पर सामान्य से कम बारिश और बर्फबारी हुई है। इससे ऊंचे इलाकों में बर्फ का जमाव कम हुआ है। सर्दियों में कम बर्फबारी का सीधा असर ग्लेशियरों के पोषण और मौसमी बर्फ के भंडार पर पड़ता है जो गर्म महीनों में नदियों और झरनों के लिए प्राकृतिक जल भंडारण प्रणाली का काम करते हैं। साथ ही बढ़ता तापमान कई पहाड़ी इलाकों में बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने की रफ़्तार बढ़ा रहा है। हालांकि ज्यादा पिघलाव से कुछ समय के लिए नदियों का बहाव बना रह सकता है, लेकिन लगातार बढ़ती गर्मी और कम बर्फबारी से समय के साथ ग्लेशियरों का द्रव्यमान धीरे-धीरे कम हो सकता है, जिससे क्षेत्र की दीर्घकालिक जल सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।

सूखे का जोखिम भी बढ़ा
पर्यावणविदों के अनुसार लंबे समय तक बारिश की कमी सूखे मौसम के दौरान जोखिम भी बढ़ाती है। कश्मीर में ऐतिहासिक रूप से गर्मियों और पतझड़ के दौरान लंबे समय तक सूखा मौसम रहा है। ऐसी घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं। अगर इस साल के आखिर में भी सूखे जैसे हालात बनते हैं तो बर्फ के कम भंडार और बारिश से पानी की कम भरपाई के कारण नदियों और झरनों में पानी का बहाव तेजी से कम हो सकता है। ऐसी स्थिति का असर जम्मू-कश्मीर के कई इलाकों में पनबिजली उत्पादन, सिंचाई नेटवर्क, खेतीबाड़ी, बागवानी, पीने के पानी की उपलब्धता और भूजल के दोबारा भरने पर पड़ सकता है।
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पानी की ज्यादा खपत वाले सेक्टर लंबे समय तक पानी की कमी और झरनों में कम बहाव के प्रति खास तौर पर संवेदनशील होते हैं। यह उभरता हुआ ट्रेंड बेहतर तैयारी की जरूरत को दिखाता है। इसमें पानी के संसाधनों का बेहतर मैनेजमेंट, संरक्षण के उपाय और बारिश के बदलते पैटर्न के असर से निपटने के लिए लंबी अवधि की प्लानिंग शामिल है। पर्यावरण की सुरक्षा और पानी के संसाधनों के टिकाऊ इस्तेमाल के बारे में लोगों में जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है। साथ ही अधिकारियों को भविष्य में पानी की कमी की किसी भी स्थिति से पहले ही निगरानी और तैयारी के उपायों को मजबूत करने की जरूरत हो सकती है।
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