दुर्पदा की लाज नाटक का मंचन किया
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अभिव्यक्ति कार्यशाला दिल्ली और उत्सव ग्रुप के सौजन्य से चौरास प्रेक्षागृह में गढ़वाली भाषा में रचित दुर्पदा की लाज नाटक का मंचन किया गया। महाभारत की कहानी पर आधारित नाटक में द्रोपदी का चीरहरण और पांडवों समेत भीष्म, विदुर व गुरु द्रोण के चुप रहने की घटना को प्रस्तुत किया गया।
उत्तराखंड रंगमंच शताब्दी नाट्य महोत्सव के तीसरे दिन उत्सव ग्रुप की प्रस्तुति दुर्पदा की लाज नाटक मुख्य आकर्षण रही। कांता घिल्डियाल की ओर से लिखित और डा. राकेश भट्ट निर्देशित इस नाटक में लोक वाद्ययंत्रों का बखूबी इस्तेमाल किया गया। कथानक के अनुसार इंद्रप्रस्थ में पांडवों के वैभव को देखकर दुर्योधन ईर्ष्या से भर जाता है।
वह मामा शकुनि से पांडवों को नीचा दिखाने की बात करता है। शकुनि सलाह देता है कि वह किसी तरह से महाराज धृतराष्ट्र को राजी कर ले कि द्यूत क्रीड़ा के लिए पांडु पुत्र युधिष्ठर को आमंत्रण दिया जाए। दुर्योधन की हठ के आगे झुकते हुए धृतराष्ट्र किसी बहाने पर पांडवों को बुला लेते हैं। दुर्योधन युधिष्ठर को द्यूत क्रीड़ा की चुनौती देता है।
दुर्योधन की ओर से मामा शकुनि पासे फेंकता है। अधर्म की लड़ाई में धर्मराज युधिष्ठर अपना राजपाट, भाई और पत्नी द्रोपदी को हार जाते हैं। दुर्योधन अपने अपमान का बदला लेने के लिए छोटे भाई दुशासन को द्रोपदी की भरी सभा में वस्त्र खींचने का आदेश देता है। द्रोपदी की पुकार पर भगवान श्रीकृष्ण उसकी लाज बचाते हैं।
द्रोपदी की स्थिति देखकर महाराज धृतराष्ट्र उसे क्षमा मांगते हैं। अंत में महाबली भीम दुर्योधन और दुशासन को मारने का प्रण लेता है। इस अवसर पर संयोजक प्रो. एसएस रावत, प्रो. डीआर पुरोहित, मनोज चंदोला, चारु तिवाड़ी, डा. अजीत पंवार और ओम प्रकाश सेमवाल आदि मौजूद थे।