वुलर पर 30 गांवों की आजीविका निर्भर
जुरिमांज के मछुआरे गुलाम मोहम्मद ने कहा कि लगभग 30 गांव सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से इस झील पर निर्भर हैं। जब आप गुरेज के लिए प्लास्टिक बैन कर सकते हैं तो जिले के अन्य हिस्सों में भी करें। उन्होंने कहा कि स्थानीय नालों की नियमित निगरानी करें। उन्होंने नाला मुदहमती का उदाहरण दिया, जहां लोग कचरा फेंकते हैं और वही वुलर में जाता है। लोग कहते हैं झील साफ कर रहे हैं लेकिन दो से तीन प्रतिशत हिस्से को साफ करने से क्या होगा।
मछली और सिंघाड़ा दोनों घटे
जुरिमांज के गुलाम हसन ने कहा कि वुलर कभी मीठे पानी और मछली के लिए जाना जाता था। आज बदबू से ही पता चल जाता है कि झील कितनी प्रदूषित है। उन्होंने कहा कि मछली उत्पादन गिरा, सिंघाड़ा उत्पादन भी घटा और दोनों के जाने से हमारी रोजी जा रही है। स्थानीय ठेकेदार अब्दुल रशीद ने बताया कि साल-दर-साल उत्पादन घटा है। पहले महिलाएं बहुत ज्यादा मात्रा में सिंघाड़ा सप्लाई करती थीं। अब बहुत कम हैं। उन्होंने कहा कि गुणवत्ता भी गिरी है।
सिंघाड़े में भारी धातुएं
महिलाओं के अनुभवों की पुष्टि साइंसटीफिक रिपोर्ट में प्रकाशित एक नए अध्ययन से हुई है। शोधकर्ताओं ने वुलर, डल, होकरसर और मानसबल झीलों से लिए गए पानी, तलछट और सिंघाड़े के पौधों में कैडमियम, क्रोमियम, निकल, जिंक और आयरन जैसी भारी धातुएं पाई हैं। अध्ययन में कहा गया कि सबसे ज्यादा प्रदूषण डल में है, लेकिन कश्मीर की सभी मीठे पानी की आर्द्रभूमियों में प्रदूषण खाद्य स्रोतों में पहुंच रहा है और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है। शोधकर्ताओं ने निरंतर निगरानी, बेहतर अपशिष्ट उपचार और सख्त प्रदूषण नियंत्रण की सिफारिश की है।