सोमवार को श्रीनगर में पहले जम्मू-कश्मीर अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के आगाज के साथ इसी पुराने रिश्ते को एक नया मंच मिला। 40 से अधिक देशों के फिल्मकारों की मौजूदगी में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर के उस सिनेमाई सफर को याद किया, जिसमें कभी शम्मी कपूर का ‘याहू’ बर्फीली ढलानों पर गूंजा था तो कभी डल झील पर ‘कश्मीर की कली’ की कहानी आगे बढ़ी।
मुख्यमंत्री ने कश्मीर की फिल्मों से जुड़ी यादों को कुछ यूं टटोला कि एक पूरी फिल्मी रील सामने आ गई। ‘जंगली’ से लेकर ‘आराधना’ और ‘सिलसिला’ तक और फिर ‘मिशन कश्मीर’, ‘हैदर’, ‘रॉकस्टार’, ‘बजरंगी भाईजान’ तक। यानी कश्मीर ने हिंदी सिनेमा के रोमांस से लेकर उसके गंभीर और संवेदनशील किरदार तक, हर दौर को वादियों में जगह दी।
फिल्म नीति : रियायतों व सुविधाओं का रोडमैप
मुख्यमंत्री ने कहा, इंडस्ट्री सिर्फ भावुकता से नहीं चलेगी। इसके लिए पूरी तरह डिजिटल सिंगल-विंडो क्लीयरेंस पोर्टल शुरू किया गया है जिससे नौकरशाही और लालफीताशाही की बाधाएं खत्म होंगी। तय समयसीमा में लोकेशन अनुमति, सुरक्षा समन्वय और पुलिस वेरिफिकेशन होगा।
स्वतंत्र फिल्मकारों से लेकर बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रोडक्शन हाउस तक के लिए शूटिंग के दिनों और स्थानीय स्तर पर किए गए खर्च के आधार पर पारदर्शी वित्तीय सब्सिडी का प्रावधान किया गया है। स्थानीय कलाकारों, तकनीशियनों व क्रू को काम देने और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाने पर विशेष वित्तीय प्रोत्साहन मिलेगा। लाइन प्रोड्यूसर्स, सिनेमैटोग्राफर्स का पेशेवर पूल और पोस्ट-प्रोडक्शन लैब्स तैयार की जा रही हैं ताकि बाहरी यूनिट्स को केवल ‘स्क्रिप्ट’ लानी पड़े और सारा तकनीकी तंत्र यहीं मिल जाए।
अब पहाड़ ही नहीं, पहाड़ों के पीछे की कहानी भी दिखे
उमर ने फिल्मकारों से कहा कि कैमरा सिर्फ बर्फीले पहाड़ों पर न रोकें। कश्मीर की असली खूबसूरती उसके लोगों, हुनर और रोजमर्रा की जिंदगी में भी है। अखरोट की नक्काशी करने वाले दस्तकार, पश्मीना बुनते हाथ, संतूर और रुबाब के सुर, रूफ की थाप, केसर की खुशबू और ठंड में कहवे की गर्म चुस्की...इन सबमें ऐसी कहानियां हैं, जिन्हें बड़े पर्दे तक पहुंचाया जा सकता है। यानी अगली बार कोई फिल्मकार कश्मीर आए तो कैमरे की नजर सिर्फ गुलमर्ग की बर्फ पर नहीं, किसी दस्तकार की उंगलियों पर भी ठहर सकती है।
तेरे बिना से ये वादा रहा... तक सीएम की अपनी कश्मीर प्लेलिस्ट भी है
मुख्यमंत्री ने फिल्मों के साथ अपनी निजी पसंद भी साझा की। मार्तंड सूर्य मंदिर में फिल्माया गया ‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं’, अमिताभ बच्चन और राखी पर फिल्माया गया ‘कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है’ और गुलमर्ग के शिव मंदिर में शूट हुआ ‘ये वादा रहा’ उनकी पसंदीदा यादों और गीतों में शामिल हैं। कश्मीर की फिल्मी यादों की यह सूची यहीं नहीं रुकती। ‘मिशन कश्मीर’ का ‘बुमरो-बुमरो’ हो या ‘रॉकस्टार’ के इम्तियाज अली वाला कश्मीर। हर दौर ने वादी को अपने तरीके से देखा। किसी ने उसे प्रेम की पृष्ठभूमि बनाया तो किसी ने संघर्ष, पहचान और रिश्तों की कहानी का हिस्सा।