डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री आपरेशन (डीजीएमओ) लेफ्टिेनेंट जनरल अनिल भट्ट का पैतृक गांव खतवाड़ पलायन की समस्या से जूझ रहा है। जिस गांव के सेरों (सिंचित खेत) में कभी फसल लहलहाती थी, वहां अब झाड़ियां ही झाड़ियां हैं।
30-35 परिवारों वाले गांव में अब दो ही परिवार बचे हैं। इनमें भी एक परिवार जाने की तैयारी में हैं। पहाड़ों से पलायन को लेकर बृहस्पतिवार को डीजीएमओ अनिल भट्ट की चिंता भी उभरकर सामने आई। उन्होंने पलायन रोकने को सरकारी प्रयासों से ज्यादा प्रवासी उत्तराखंडियों से उल्टा पलायन करने की जरूरत बताई। यानी शहरों में बस चुके लोग अपने पैतृक गांवों में लौट आएं।
मालूम हो कि डीजीएमओ भट्ट टिहरी जिले की लोस्तू पट्टी के खतवाड़ गांव (ग्राम पंचायत तल्ली रिगोली) के रहने वाले हैं। उनका परिवार काफी साल पहले मसूरी चला गया था। अनिल भट्ट के डीजीएमओ बनने के बाद से खतवाड़ गांव सुर्खियों में है। बुधवार को डीजीएमओ एक धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने गांव पहुंचे तो गांव फिर चर्चाओं में आ गया। खतवाड़ गांव पलायन से संघर्ष कर रहा है।
30-35 परिवार वाला यह गांव आज खंडहर बन चुका है। जैसे-जैसे लोग तरक्की करते गए, गांव खाली होता गया। अब गांव में दो ही परिवार बचे हैं। एक परिवार योगेंद्र चमोली का है और दूसरा योंगेंद्र भट्ट का। दोनों परिवारों के सात सदस्य ही गांव में रह गए हैं।
स्थानीय निवासी योगेंद्र चमोली बताते हैं कि गांव खाली हो चुका है। वीरान घर डराते हैं। उनके तीन बच्चे हैं, जो तीन किमी दूर अचरीकुंठ में पढ़ते हैं। योगेंद्र बदरीनाथ में छह माह काम करके किसी प्रकार का गुजर बसर करते हैं। उनकी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि वह बच्चों को पढ़ाने के लिए कहीं बस सके।
योगेंद्र का कहना है कि कभी गांव में इतनी भीड़ होती थी कि लगता था कि मेला लगा हो। दूसरा परिवार भी गांव से जाने वाला है। उनका किसी सुविधाजनक स्थान में मकान बन चुका है।
अब पलायन उल्टा करना है। लोग वापस आकर बसें, लेकिन यह सत्य भी देखना और जानना है कि पलायन क्यों हुआ है। क्या कमियां रही हैं जो लोग यहां से गए। ऐसे प्रयास किए जाने चाहिए कि लोग वापस आते रहे। पहले मैं भी सर्दियों में हर साल आता था। अबकी बार 5-6 साल में आया हूं।
- ले. जनरल अनिल भट्ट, डीजीएमओ (गांव में लोगों से मुलाकात के दौरान)