सईद के केंद्रीय गृह मंत्री बनने के 5 दिन बाद ही आतंकियों ने कर लिया था रूबिया का अपहरण
आतंकियों ने 1989 में रूबिया सईद का जिस दिन अपहरण किया उससे पांच दिन पहले ही उनके पिता एवं पीडीपी के संस्थापक मुफ्ती मोहम्मद सईद केंद्रीय गृह मंत्री बने थे। उस समय रूबिया ललदेद अस्पताल में एक मेडिकल इंटर्न के तौर पर काम करती थीं और 23 वर्ष की थीं।
आठ दिसंबर 1989 को शाम करीब पौने चार बजे रूबिया अस्पताल से मिनी बस से घर लौट रही थीं। वह नौगाम स्थित उनके घर से महज आधा किलोमीटर दूर रहीं होगी कि तभी चार आतंकवादियों ने बंदूक के जोर पर उन्हें जबरन बस से उतार लिया। इसके बाद मारुति कार में बैठाकर फरार हो गए। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने इस अपहरण कांड की जिम्मेदारी ली थी।
रूबिया को छोड़ने के बदले तत्कालीन भाजपा समर्थित वीपी सिंह सरकार को पांच आतंकी रिहा करने पड़े थे। उस वक्त जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला इलाज के सिलसिले में लंदन में थे। सूचना मिली तो आनन-फानन में वह दौरा बीच में छोड़कर श्रीनगर लौट आए। रूबिया आतंकवादियों के कब्जे में ही थीं। पांच दिन सरकार और आतंकवादियों के बीच बातचीत के बाद सरकार ने आतंकियों के रिहा किया गया था। आतंकियों को छोड़े जाने के तीन घंटे बाद रूबिया को छोड़ा गया।
इस अपहरण में जेकेएलएफ प्रमुख यासीन मलिक को मुख्य आरोपी है। अपहरण का यह मामला सदर पुलिस स्टेशन श्रीनगर में दर्ज हुआ था। तत्कालीन राज्य सरकार की सिफारिश पर 22 फरवरी 1990 को सीबीआई ने केस अपने हाथ में लिया। 18 सितंबर, 1990 को सीबीआई ने चार्जशीट दायर की थी।
जेकेएलएफ ने पांच आतंकी छोड़ने की रखी थी शर्त
जेकेएलएफ ने रूबिया को छोड़ने के बदले पांच खूंखार आतंकियों को रिहा करने की शर्त रखी थी। तब केंद्र सरकार ने आतंकवादियों के साथ बातचीत और सौदेबाजी का रास्ता चुना। जेकेएलएफ ने आतंकी अब्दुल हमीद शेख, गुलाम नबी भट, नूर मोहम्मद कलवाल, मोहम्मद अल्ताफ और जावेद अहमद जरगर को छोड़ने की शर्त रखी। बाद में उसने जरगर के बजाय अब्दुल अहद वाजा को छोड़ने की मांग की। उस समय हमीद शेख का श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर अस्पताल में इलाज चल रहा था क्योंकि वह घायल था।
अपहरण के बाद घाटी में बेकाबू होने लगा था आतंकवाद
रूबिया अपहरण कांड के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद ने इतना गंभीर रूप ले लिया कि महज एक साल के भीतर हालात बेकाबू हो गए। घाटी में कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर नरसंहार होने लगा। खुलेआम उन्हें धर्म परिवर्तन करने, भागने या फिर मरने के लिए तैयार रहने की धमकी दी जाने लगी। आखिरकार कश्मीरी पंडितों को अपनी जान बचाने के लिए घर-दुकान, खेत-खलिहान, अचल संपत्तियों को छोड़कर भागना पड़ा।