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बडगाम: पतझड़ की ठंडी धूप में सुलगी बगावत, दो हजार समर्थकों के बीच आगा रुहुल्ला ने छोड़ी नेशनल कॉन्फ्रेंस

Wed, 04 Nov 2026 11:27 AM IST
Nikita Gupta अमृतपाल सिंह बाली, अमर उजाला नेटवर्क, बडगाम

सार

बडगाम के बिहिश्त-ए-जहरा पार्क में हजारों समर्थकों की मौजूदगी के बीच आगा रुहुल्ला मेहदी ने करीब 80 मिनट के भाषण के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस और लोकसभा सदस्यता से इस्तीफे का एलान किया। उन्होंने उमर और फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए पार्टी पर वादे पूरे न करने और जनता की उम्मीदों पर खरा न उतरने का आरोप लगाया।
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रुहुल्ला के समर्थन में बडगाम में उमड़ा जनसैलाब - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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श्रीनगर से करीब 17 किलोमीटर दूर बिहिश्त-ए-जहरा पार्क के चारों ओर मंगलवार सुबह से ही अजीब सी गर्माहट और राजनीतिक हलचल महसूस की जा रही थी। चिनार के पीले पत्तों पर सरसराती ठंडी हवा, सुस्त धूप और दूर तक फैला सन्नाटा सुबह ठीक आठ बजे टूटने लगा। पार्क के लोहे के भारी मुख्य द्वार पर जब पहली बार कदमों की आहट तेज हुई तब शायद ही किसी को अंदाजा रहा होगा कि दोपहर ढलते-ढलते यह मैदान कश्मीर की राजनीति के एक बड़े अध्याय के पलटने का गवाह बन जाएगा।

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मंच से सुबह दस बजे से ही वक्ताओं ने इस ऐतिहासिक रैली को संबोधित करना शुरू कर दिया था। मंच से बोलने वाले वक्ता जब भी श्रीनगर की सत्ता और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का नाम लेते तो फिजाओं में तल्ख नारों की गूंज उठती। भीड़ का मिजाज साफ था, हुकूमत से नाराजगी और अपने ‘आगा’ पर यकीन।

घड़ी की सुइयां जब सवा ग्यारह की तरफ मुड़ीं तो दो हजार से अधिक समर्थकों के रेले के बीच आगा रुहुल्ला का काफिला दाखिल हुआ। समर्थकों का जुनून इस कदर था कि गेट से मंच तक की महज चंद कदमों की दूरी तय करने में रुहुल्ला को पूरे 15 मिनट लग गए। लोग उनकी एक झलक पाने, उनका हाथ छूने और उनकी दस्तार के साए में आने को बेताब थे। जैसे ही रुहुल्ला मंच की सीढ़ियां चढ़े, पूरा पार्क उनके समर्थन में नारों से गूंज उठा। रुहुल्ला ने सिर झुकाकर लोगों के इस जज्बे को सलाम किया लेकिन उनकी आंखों में एक सख्त सियासी फैसला साफ तैर रहा था।

करीब एक घंटा बीस मिनट तक रुहुल्ला ने संबोधित किया। उनके हर लफ्ज में कश्मीर का दर्द, टूटे हुए वादों की चुभन और सियासत का खोखलापन था। उन्होंने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व उमर अब्दुल्ला और डॉ. फारूक अब्दुल्ला को सीधे कटघरे में खड़ा किया। भीड़ सांस थामे सुन रही थी। ठीक दोपहर के दो बजकर चालीस मिनट पर वह लम्हा आया जिसकी तपिश पूरा कश्मीर महसूस कर रहा था। रुहुल्ला ने भारी आवाज में नेशनल कॉन्फ्रेंस की प्राथमिक सदस्यता और लोकसभा सांसद के पद से हमेशा के लिए अपने इस्तीफे का औपचारिक ऐलान कर दिया।

इस घोषणा के साथ ही पार्क में मौजूद जनता का उत्साह चरम पर पहुंच गया। रैली में लोगों का कहना था कि आगा का यह फैसला बिल्कुल सही और वक्त की सबसे बड़ी मांग है। लोगों में इस बात को लेकर भारी रोष था कि उन्हें ऐसा मुख्यमंत्री या सरकार नहीं चाहिए जो युवाओं के भविष्य की सुध लेने के बजाय सिर्फ साइकिलिंग और मैराथन दौड़ने में व्यस्त रहे।

कोई आंसू पोंछता दिखा तो कोई लगाता रहा नारे
टंगमर्ग से आए बुजुर्ग मुश्ताक अहमद वानी नम आंखों को पोंछते हुए बोले, चालीस साल से हमारी नस्लें पिस रही हैं। आगा साहब ने इस पार्टी को अपने खून-पसीने से जिताया था। वे बेदाग हैं। अगर हमारे बच्चे भी उनके रास्ते पर कुर्बान हो जाएं, तो हमें रंज नहीं होगा।

लावेरपोर के फिदा हुसैन करबलाई का गुस्सा सत्ता की प्राथमिकताओं पर फूट पड़ा। वे तल्ख लहजे में बोले, आज का कश्मीर नाचने-गाने और मैराथन दौड़ने का नहीं, अवाम के जख्मों पर मरहम रखने का है। हमारे नौजवान पीएसए में बंद हैं, बहनें खौफ में हैं और हुकूमत जश्न मना रही है। आगा साहब का यह इस्तीफा इस घुटन पर सच्चा तमाचा है।

बडगाम के ही रहने वाले गुलाम मोहिउद्दीन ने कहा कि वे उन्हें इब्तिदा से अपना कायद मानते आए हैं। चूंकि आगा साहब का ताल्लुक सीधे रसूले खुदा के खानदान से है, इसलिए वे कभी झूठ नहीं बोल सकते। 2024 के चुनाव में नेकां ने जनता के सामने जो मेनिफेस्टो रखा गया था, जब वह जमीन पर पूरा होता नहीं दिखा और उनकी बात न तो संसद में मानी गई और न ही विधानसभा में।

वर्ष 2000 में आज ही के दिन रुहुल्ला ने अपने पिता को खोया था
2000 में आज ही के दिन आगा रुहुल्ला ने एक बम विस्फोट में अपने पिता को खोया था। वर्षों बाद इसी तारीख को उन्होंने सत्ता की सबसे बड़ी कुर्सी को ठोकर मारकर अवाम के बीच खड़े होने का रास्ता चुना। बिहिश्त-ए-जहरा पार्क से जब लोग शाम ढले रुखसत हो रहे थे तो उनके चेहरों पर मायूसी नहीं बल्कि एक नए सियासी दौर के आगाज का गहरा यकीन था।

सियासी जलजले के बीच मैदान में मासूमियत की तस्वीर
बडगाम में सियासी जलजले के बीच मैदान के एक कोने में मासूमियत की ऐसी तस्वीर भी दिखी जिसने सबको भावुक कर दिया। सालाना परीक्षाओं की छुट्टियों का लुत्फ उठा रहे 9 साल के दायिम रजा व 8 साल के आरिज के लिए यह कोई राजनीतिक रैली नहीं, बल्कि अपने पसंदीदा नेता के प्रति प्यार जताने का मौका था।

तीसरी के दायिम अपने छोटे-छोटे हाथों में उर्दू में लिखा एक पोस्टर थामे खड़े थे, वादा कुर्सी से बड़ा है। दायिम से इसका मतलब पूछा गया तो उन्होंने पोस्टर फर्राटेदार उर्दू में पढ़ दिया। उनके दादा मो. रफीक ने बताया कि दायिम रात भर ठीक से सो भी नहीं पाया था और सुबह से ही बेहद उत्साहित था।

हारवन से 30 किमी सफर तय कर आए 8 साल के आरिज पिता आबिद हुसैन के साथ सुबह 5 बजे पार्क पहुंच गए थे। पहली कक्षा के आरिज ने कहा, रुहुल्ला साहब बहुत अच्छे और ईमानदार इंसान हैं, मैं यहां उन्हें अपना सपोर्ट देने आया हूं।
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कांग्रेस ने इस्तीफे को बताया वैचारिक मतभेद
प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष तारिक हमीद कर्रा ने कहा कि रुहुल्ला का नेकां को छोड़ना अलग राजनीतिक दृष्टिकोण और वैचारिक तालमेल की कमी की वजह से हुआ प्रतीत होता है। रुहुल्ला का दृष्टिकोण अलग था, पार्टी दूसरी दिशा में आगे बढ़ रही थी। संभवतः उनके बीच वैचारिक अनुकूलता का अभाव था। उन्होंने स्पष्ट किया कि नेकां के साथ गठबंधन और जुड़ाव पर कांग्रेस पूरी तरह अडिग है। वहीं, पीडीपी ने कहा कि इस्तीफों से जम्मू-कश्मीर के बुनियादी मुद्दों का समाधान नहीं हो सकता।
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