श्रीनगर। शौकत अहमद की मां बीस साल बीत जाने के बाद भी बेटे के लौटने का इंतजार कर रही है। इंतजार उसकी आंखाें से आंसू बन कर बह रहा है। जब भी कोई सालों बाद सरहद पार से लौटता है तो दिल की धड़कने तेज हो जाती हैं। जब बेनाम कब्रों की निशानदेही होती है तो दिल बैठ जाता है। बेटे के इंतजार ने न केवल उसकी नींदें छीन ली हैं बल्कि उसको बीमारियों ने भी घेर लिया है। यही हाल मोहम्मद इकबाल की मां राजा बेगम का है। वह सरकार के साथ साथ एजेंसियों से सही सवाल करते करते थक गई है कि उसके बेटे को कहां छोड़ आए हो। विरोध प्रदर्शन से अपनों को याद करने की नाकाम कोशिश जरूर हो सकती है। एसोसिएशन आफ पेरेंटस डिसएपेयर्ड पर्सन की ओर से आयोजित शांतिपूर्ण प्रदर्शन में आतंकवाद के दौर में बच्चों को खो चुके अभिभावकों ने खामोश जुबानों और मुरझाए चेहरों से बता दिया कि वह किसी शिद्दत से अपने बेटों का इंतजार कर रहे हैं। एसोसिएशन के अनुसार ऐसे अभिभावक बहुत ही गरबी से जीवन गुजार रहे हैं। सरकार अभी तक उनके जख्मों पर मरहम नहीं लगा पाई है और न ही इनमें एजेंसियों के प्रति विश्वास बहाल हो पाया है।
प्रदर्शन कर रही अजीजी बेगम और फातिमा अपने बचों की तलाश में देश भर की सारी जेलों को छान चुकी है। थक हार कर वह वापस कश्मीर लोटे तो यहां हर एक एजेंसी और सरकार ने उन्हें मदद का यकीन दिलाया । लेकिन यही मायनों में कोई आगे नही आया। एक तरफ अपनों को खाने का गाम और दूसरी और जिंदा रहने की जंग । उन्होंने बहुत मुश्किल सफर देखा है।