एक ग़ैर कश्मीरी की नज़र से देखा जाए तो भारतीय कश्मीर में सब कुछ अच्छा और बेहतर हुआ है। लेकिन साथ ही ये भी सोचना होगा कि पिछले बीस साल से भी अधिक समय से सेनाएं वहां तैनात हैं जिनका दखल आम आदमी के जीवन में है।
ज़ाहिर है कि एक दबी हुई नाराज़गी और ग़ुस्सा है। वो ग़ुस्सा फूटता है पथराव के रूप में। स्थानीय लोग पथराव के बारे में बहुत आम तरीक़े से बात करते हैं, जैसे ये कोई आकर्षण की बात हो। ज़रूरत है उन कश्मीरियों के विरोध के भाव को समझने की।
शाम ढल रही है डल झील पर। वसीम हिदायत देता है कि अंधेरा होने के बाद लाल चौक पार करने में मुश्किल होगी। दिन भर के घूमने फिरने में भूल गया था कि आज भी श्रीनगर बंद था।
बंद मतलब पुराना शहर यानी जामा मस्जिद, लाल चौक वाले इलाक़े बंद रहेंगे। एक भी दुकान नहीं खुलेगी और नमाज़ के बाद पथराव होगा। लोग पथराव के बारे में ऐसे बात करते हैं मानो आइसक्रीम खाने जा रहे हों। पथराव के इलाक़े और समय तय हैं।
लाल चौक से अंदर जाने वाली बड़ी सी गली पर कंटीले तार बिछे हैं। बटमालू से लेकर डल झील तक मेरी बुलेट कोई नहीं रोकता। मुख्य सड़क पर लोग आ जा रहे हैं लेकिन अगल-बगल की बंद दुकानें चीख-चीखकर कहती हैं कि श्रीनगर में सबकुछ ठीक नहीं है। कुछ दबा हुआ सा है, जो फट पड़ना चाहता है।
टूरिस्टों की भीड़
कुछ दुकानदारों ने हिम्मत करके दुकानें खोली हैं। हम आगे बढ़ जाते हैं। शालीमार, निशात बाग, हरवन पार्क, दाछीगाम नेशनल पार्क की तरफ़। वो श्रीनगर जो अख़बारों में छपता है वो कहीं यादों से गुम सा रहता है तब तक जब तक आप डलगेट को पार करके शहर में नहीं आते। केसर खरीदना भूल गया था लेकिन आज कोई दुकान खुली नहीं है। लाल चौक के सामने घंटाघर के पास एक दुकान खुली है। केसर मिल गया। मैं वसीम से कहता हूं लाल चौक की तरफ से नहीं जाएंगे।
वो कहता है, "चलिए पथराव दिखाता हूं।" अंधेरा घिरने ही वाला है। हम बुलेट से ही लाल चौक पार करते हैं। कंटीले तारों के पार नौजवान दिख रहे हैं। पथराव जारी है। पुलिस रह-रह के जवाब देती है। अंधेरा होने के बाद पथराव बंद हो जाएगा। लोग अपने घरों को चले जाएंगे। पुलिस भी अपने बंकरों में।
क्या विरोध बंद हो जाएगा
दो दिन पहले एक नौजवान से मिला था। वो फ्रीलांस पत्रकार है। गाने लिखता है और रैप गाता है। उसकी कविताएं भी छपी हैं ऐसा उसने बताया। मिलते ही उसने मुझसे कश्मीर की राजनीति पर बहस की कोशिश की जिसे मैंने यह कहते हुए टाल दिया कि मुझे कश्मीर के बारे में कुछ ख़ास नहीं पता है।
मैंने उससे यह ज़रूर पूछा था कि आगे क्या? उसने बहुत सारी बातों में एक बात सूफ़ियाना अंदाज़ में कही, "लोगों ने कहा बंदूकें छोड़ दो, यूथ ने बंदूकें छोड़ दीं, कल को कहेंगे पथराव ग़लत बात है, तो यूथ पथराव भी छोड़ देगा।"
मैं इसमें बस एक पंक्ति जोड़ता हूं।।।कल को लोग कहेंगे विरोध करना ग़लत है तो क्या कश्मीर का यूथ विरोध भी छोड़ देगा? मैं डरता हूं कि कहीं पथराव भी एक टूरिस्ट आकर्षण जैसा न बन जाए जहां लोग बख्तरबंद गाड़ियों में डल झील से लाल चौक आएं - पथराव देखने।
ऐसा नहीं है कि हालात बदले नहीं हैं। एक ग़ैर कश्मीरी की नज़र से देखा जाए तो सब कुछ अच्छा और बेहतर हुआ है भारत प्रशासित कश्मीर में। लेकिन अगर कोई ये सोचे कि पिछले बीस साल से भी अधिक समय से सेनाएं वहां तैनात है जिसका दखल आम आदमी के जीवन में है।
सैकड़ों नौजवान मारे गए हैं, जिनमें से कई बेगुनाह थे। कई बच्चे अभी भी लापता हैं जिनकी मांओं को ये तक नहीं पता कि उनका बच्चा ज़िंदा है या मर गया। मैं फ़िलहाल लड़कियों के बलात्कार जैसी घटनाओं का जिक्र तक नहीं कर रहा हूं।
कारगर रास्ता
कश्मीरी इन सच्चाइयों के साथ जीते हैं और इन सबके बावजूद टूरिस्टों का स्वागत करते हैं। ये पता चलने पर कि मैं दिल्ली से अपनी मोटरसाइकिल से आया हूं, चाय पीने के लिए आमंत्रित करते हैं।
ज़ाहिर है कि एक दबी हुई नाराज़गी और ग़ुस्सा है। ये कैसे ख़त्म होगा मुझे नहीं पता। मैं चाहता हूं कि कश्मीरी युवा असहमत होने पर विरोध करना न भूले। शायद विरोध का कोई नया और कारगर रास्ता निकालना बेहतर उपाय होगा ताकि उनकी पीड़ा को और उनके भावों को अन्य लोग भी समझ पाएं।
और हां ये न समझें कि भारतीय आर्मी का विरोध करने वाला भारत प्रशासित कश्मीर का युवा पाकिस्तान या चीन को पसंद करता है। शायद 20-25 साल आर्मी के साए में दर्द झेलते लोग सभी के ख़िलाफ़ हो जाते हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि कश्मीरी भी आज सबके ख़िलाफ़ हैं- चाहे वो भारत हो, पाकिस्तान हो, चीन हो या फिर अमरीका।