-ट्रोपिन की प्रभावशीलता के बावजूद ऑर्गनोफॉस्फोरस विषाक्तता के लक्षणों की अनुपस्थिति ने खड़े किए सवाल
-इलाज के पीछे रिपोर्टों के आंकड़े और अनुभव ही रहा आधार: डॉ.भाटिया
संवाद न्यूज एजेंसी
राजोेरी। सरकारी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) राजोेरी के प्रिंसिपल डॉक्टर एसएस भाटिया ने बड्डाल गांव के मरीजों को छुट्टी देने का फैसला टालने के बाद कहा कि फिलहाल हम विष की सटीक प्रकृति के बारे में अनिश्चित हैं। एट्रोपिन की प्रभावशीलता के बावजूद ऑर्गनोफॉस्फोरस विषाक्तता के लक्षणों की अनुपस्थिति ने डॉक्टरों के बीच सवाल खड़े कर दिए हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि ऑर्गनोफॉस्फोरस के साथ कोई अन्य जहर मौजूद था या एट्रोपिन किसी अन्य अज्ञात विष के खिलाफ प्रभावी है।
डॉक्टर भाटिया ने कहा कि हमने उपलब्ध आंकड़ों और अनुभव के आधार पर उपचार किया, जिसमें एट्रोपिन भी शामिल है। यह टीका 100% रिकवरी हासिल करते हुए गेम-चेंजर साबित हुआ। सटीक विष का पता चलने के बाद और मरीजों को संभावित दीर्घकालिक प्रभावों से बचाने के लिए उचित दवा देकर ही छुट्टी दी जाएगी। डॉक्टर भाटिया ने कहा कि अभी तक एट्रोपिन का पहलू चौंकाने वाला है। कई जहरों के दीर्घकालिक प्रभाव होते हैं, जो सेवन के तीन से छह सप्ताह बाद प्रकट हो सकते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए टीम ने फैसला लिया कि रोगियों को अस्पताल में ही रखा जाएगा ताकि जरूरत पड़ते पर दोबारा जीएमसी लाने की नौबत न आए। छुट्टी देने का अंतिम निर्णय केंद्रीय फोरेंसिक प्रयोगशालाओं के परिणामों पर निर्भर करेगा।