पुंछ जिले के नियंत्रण्र रेखा के गांव दबराज में पाकिस्तानी गोलाबारी की आशंका से बंकर के पास खेलते
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पुंछ। नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तानी सेना की तरफ से एक वर्ष से अधिक समय से रिहायशी इलाकों को निशाना बना कर करीब-करीब हर दिन की जाने वाली गोलाबारी से नियंत्रण रेखा से सटे ग्रामीण क्षेत्रों में जन जीवन प्रभावित है। लोग अपनी मन मर्जी से कोई भी काम नहीं कर पा रहे हैं। पाकिस्तानी गोलाबारी का नियंत्रण रेखा से सटे क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों पर सबसे अधिक असर पड़ा है। हर दिन होने वाले बम धमाकों की आवाजों के बीच बचपन बचपन का चहकपन, खिल खिलाहट और मौजमस्ती दब कर रह गई है।
नियंत्रण रेखा से सटे पाकिस्तानी गोलाबारी प्रभावित क्षेत्रों में अब यह आलम है कि बच्चे गांव में घरों के बाहर खुल कर खेल भी नहीं पा रहे हैं। क्योंकि पाकिस्तानी सेना की तरफ से समय असमय मोर्टारों से की जाने वाली गोलाबारी के चलते जहां मां बाप बच्चों को घरों से बाहर निकल कर खेलने से रोक रहे हैं। वहीं जान के खतरे को देख कर कई बच्चे स्वयं भी बाहर खुले में निकलने से डरते हैं। इसके कारण उनका बचपन घर की चारदीवारी या आंगन तक ही सीमित हो कर रह गया है। क्योंकि सात माह से कोरोना के चलते स्कूल भी बंद होने के कारण बच्चों को कहीं आने जाने का मौका भी नहीं मिल रहा है। नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तानी गोलाबारी से प्रभावित बचपन का करीब से अनुभव जिले के मेंढर सब डिवीजन के मनकोट सेक्टर के सबसे अधिक पाकिस्तानी गोलाबारी से प्रभावित गांव दबराज में देखने को मिलता है। जहां बच्चे गोलाबारी थमने के बाद गांव में घरों के कुछ दूरी पर बने सामुदायिक बंकरों के आसपास अपने साथियों के साथ खेल कर मन बहलाते नजर आते हैं।
खेल-खेल में यह बच्चे बंकरों के आसपास 10 या 20 मीटर के दायर से बाहर तक नहीं जाते हैं और हल्के से धमाके की आवाज सुनकर खेल को वहीं छोड़ भाग कर बंकर में पनाह ले लेते हैं ताकि उन्हें पाकिस्तानी गोलाबारी से जानी नुकसान न उठाना पड़े। बंकरों के आसपास या घरों के आंगन में ही छोटा-मोटा खेल खेलते हुए अपने बचपन को आगे बड़ा रहे। इन बच्चों का कहना है कि पाकिस्तान की तरफ से हर गांव में गोले दागे जाते हैं जिसके कारण हमें मम्मी-पापा बाहर नहीं जाने देते हैं। जब भी खेलने का मन करता है तो हम अपने भाई बहनों या पड़ोसी बच्चों के साथ घर के अंदर या बंकर के पास कुछ समय के लिए खेल लेते हैं और जब कभी हमें लगता है कि गोलाबारी शुरू हो गई है तो हम वहीं बंकर में छुप जाते हैं, लेकिन इसमें हमें कोई मजा नहीं आता है। पहले स्कूल जाते थे तो वहां गांव के दोस्तों के साथ खेलकूद मौज मस्ती कर लेते थे। अब वो सब भी नहीं हो पा रहा है पता नहीं कब यह गोलाबारी बंद होगी और हम पूरे गांव में जहां दिल करेगा, वहां घूमेंगे खेलेंगे।
यह अकेले गांव दबराज की बात नहीं है बल्कि जिले में नियंत्रण रेखा से सटे करीब करीब हर गांव का ऐसा ही माहौल है जहां पाकिस्तानी गोलाबारी के चलते बचपन घरों या बंकरों के आसपास ही सीमित हो कर रह गया है।