नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष एवं सांसद फारूक अब्दुल्ला ने शनिवार को एक बार फिर कहा कि नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच वार्ता शांति के बिना असंभव है। दोनों मुल्कों को स्थिरता और आपसी सहयोग के लिए उचित प्रयास करने चाहिए।
उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार के कश्मीर में हालात सामान्य होने के दावे जमीनी स्तर की परिस्थितियों के विपरीत हैं। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को गंभीरता और ईमानदारी की भावना के साथ लेना चाहिए।
कश्मीर के लोगों की आकांक्षाओं के साथ इसे जोड़ने के लिए अभी विश्वास की कमी है। बडगाम जिले के खान साहिब के हार्दपंजू क्षेत्र में शनिवार को एक जनसभा में फारूक ने कहा, वर्ष 2016 की तबाही, रक्तपात और दुख के बाद कश्मीर में चीजों में सुधार का दावा करने वाले खुद की जिम्मेदारी से बचने का प्रयास कर रहे हैं।
घाटी के युवाओं को पहले से कहीं अधिक निराशा और नाउम्मीदी हुई है। दोनों परमाणु शक्तियों से संलिप्त भारत और पाकिस्तान को स्वीकार करना चाहिए कि एक परमाणु युद्ध सवाल से बाहर है।
हिंसा और युद्ध की वकालत करने वाले लोग भ्रम में जी रहे हैं। उनकी लफ्फाजी अपने ही स्थानीय निर्वाचन क्षेत्रों के लिए है। दोनों पक्षों की व्यावहारिक सीमाओं में स्थिरता लाने के लिए कोई और विकल्प नहीं है।
हम कश्मीर में एक और पीढ़ी के सपनों और आकांक्षाओं का त्याग नहीं कर सकते हैं। भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए यह समझने का समय आ गया है कि वे जम्मू-कश्मीर के लोगों को अपनी भावनाओं के अनुसार इस मुद्दे के हल के लिए सकारात्मक पहल करें। लोगों में राज्य सरकार की नीतियों के खिलाफ गुस्सा है।