फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अपने ही घर में बेगाने होने का दर्द

विज्ञापन
विज्ञापन
गंदरबल की रहने वाली विट्टी रैना (बदला हुआ नाम) 1992 में आठवीं कक्षा में पढती थीं जब चरमपंथियों ने उनके पिता की गोली मारकर हत्या कर दी थी। धमकी दी गई कि पूरा परिवार कश्मीर छोड दे। दस दिनों के भीतर ही परिवार को कश्मीर घाटी छोडनी पडी। घर-बार, सामान सब पीछे छूट गया।
विज्ञापन


केंद्र सरकार के आर्थिक पैकेज पर भरोसा करके 18 साल बाद अपने बच्चों के साथ वो कश्मीर वापस लौटीं।

उनसे मेरी मुलाकात श्रीनगर से सटे बडगाम जिले के शेखपोरा इलाके में पंडितों की पुनर्वास कॉलोनी में हुई। दो कमरे के मकान में दो परिवार रहते हैं। जमीन पर दरी बिछी थी।

घर के एक कोने में दीवार पर पूजाघर बना था, जिसमें साईं बाबा और मां दुर्गा के अलावा दूसरे हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरें रखीं थीं।

बच्चे आसपास खेल रहे थे। शेखपोरा में कश्मीरी पंडितों के करीब 350 परिवार रहते हैं। विट्टी बताती हैं, "हमने अपना घर, गाय का बाडा और सात कनाल जमीन स्थानीय मुसलमानों को सौंपी थी, ताकि हमारी गैरमौजूदगी में वे उनका ध्यान रखें।"
विज्ञापन
Trending Videos

घर पर दूसरों का कब्जा

वे कहती हैं, "अब वो हमारा घर वापस नहीं देते। जब मैं अपना मामला स्थानीय डिप्टी कमिश्नर के पास ले गई, तो उन्होंने कहा, जिसके पास 14 साल से घर का कब्जा है, उससे घर कैसे छीन लूं।"

बोलते-बोलते उनकी आखों में आंसू आ जाते हैं।

विट्टी के चार साल के भाई ने पिता का अंतिम संस्कार किया। विट्टी के दादा, दादी मानसिक तौर पर बीमार हो गए। दादा अपने बेटे का नाम राम नाम की तरह जपते थे। जम्मू में 10 गुणा 10 के कमरे में छह लोग रहने को मजबूर थे।

वो कहती हैं, "जम्मू में खाने के लिए कुछ नहीं था। पिताजी की पेंशन मिलनी शुरू होने में चार महीने लग गए। तब तक हम रिश्तेदारों पर निर्भर रहे। परेशानियों के बीच परिवार ने 16 साल की उम्र में मेरी शादी कर दी। चरमपंथ के कारण मैंने अपना बचपन जिया ही नहीं"।

वर्ष 2008 में कश्मीरी पंडितों के लिए आर्थिक राहत पैकेज की घोषणा की गई। इसके अंतर्गत पंडितों को अपना घर बनाने के लिए आर्थिक सहायता और उन्हें घाटी में नौकरियां देने का प्रावधान था। विट्टी रैना कश्मीर में नौकरियां पाने वाले कश्मीरी पंडितों में शामिल थीं।

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के संजय टिक्कू के अनुसार शुरुआत में छह हजार पंडितों को नौकरियां दिए जाने का प्रावधान था, जिसमें से तीन हजार नौकरियों का आर्थिक भार केंद्र सरकार को और बाकी का भार जम्मू-कश्मीर की सरकार को वहन करना था, लेकिन राज्य सरकार ने कहा कि वो खर्च का भार बर्दाश्त नहीं कर पाएगी।

संजय टिक्कू कहते हैं, "आज की तारीख में तीन हजार में से करीब 1900 पंडितों ने नौकरियां ली हैं। ये नौकरियां स्वास्थ्य, इंजीनियिरिंग, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में हैं, इनमें से 850 महिलाएं हैं"।

टिक्कू के अनुसार 1992 में कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों की संख्या 32 हजार के आसपास थी। उनकी संस्था ने 2008-09 में एक सर्वे किया, जिसमें पाया गया कि 2764 पंडित ही घाटी में रह गए थे।

असुरक्षा की गहरी भावना

प्रधानमंत्री पैकेज के आधार पर वापस आए पंडितों को मिला दें तो टिक्कू के अनुसार करीब सवा चार हजार कश्मीरी पंडित घाटी में मौजूद हैं।

कश्मीर वापस आने के अपने फैसले पर विट्टी रैना कहती हैं, "मुझे यहां की सरजमीं से प्यार है। मेरे साथ बचपन की यादें थीं जो बहुत सता रही थीं। मुझे लग रहा था कि मैं अपने पापा को खोजूं कि वो कहां पर हैं। मैं अपने पापा से बहुत प्यार करती थी। कभी-कभी मैं अपने घर पर जाती हूं। मैं वहां पापा को महसूस करती हूं।" ये कहते-कहते वह रो पडती हैं।

वह कहती हैं, "मैं वहां जाती हूं, घूमती हूं, लेकिन दूर से। वो अब अपना नहीं है। हमारा घर गिरा दिया गया है। वहां अब बाग बना हुआ है।" जम्मू से दोबारा श्रीनगर आने का फैसला उनके लिए आसान नहीं था।

जम्मू में पति का स्टेशनरी का कारोबार था। मां पुरानी यादों को भुला नहीं पा रही थीं इसलिए वापस नहीं आना चाहती थीं। आखिरकार 2010 में वो दो बच्चों के साथ वापस घाटी वापस आ गईं।

उनकी बेटी 10वीं में पढती है और लडका सातवीं में, लेकिन वो आज खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं। इतना कि उन्हें वापस आने का फैसला अब गलत लगता है।

असुरक्षा की भावना इतनी गहरी है कि कश्मीरी पंडित काम के अलावा कॉलोनी की चारदीवारी में ही रहते हैं। उनके बच्चे भी स्कूलों से वापस आने के बाद बाहर नहीं जाते।

विट्टी रैना कहती हैं, "हमें समझ नहीं आता कि बच्चों को ट्यूशन के लिए कहां भेजें। बच्चों को संगीत, ट्यूशन क्लासों के लिए भेजने में डर लगता है।"

विट्टी रैना के साथ उसी दो कमरे में रहने वाली आरती कौल सरकारी स्कूल में टीचर हैं।

वह भी बच्चों के भविष्य को लेकर परेशान हैं। उनके पति जम्मू में सरकारी प्रेस में काम करते हैं। श्रीनगर के जैना कदल इलाके में उनका सात मंजिलों का मकान था जहां उनके चाचा करीब 40-50 बच्चों को ट्यूशन पढाते थे।

उन दिनों को याद करते हुए वह कहती हैं, "आज भी मुझे याद है कि जैसे ही तीन बजते थे, जोर-जोर से आवाजें आती थीं, ऐ जालिमों, ऐ काफिरों कश्मीर हमारा छोड दो। उस वक्त नहीं पता चलता था कि ये जालिम, ये काफिर कौन थे, या कौन नहीं थे। हम छोटे थे, हमें पता नहीं था कि माजरा क्या है। हमें क्यों बाहर निकलना है। एक दिन उन्होंने हमें गले से पकडा और कहा कि हम सुबह तक कश्मीर घाटी छोड दें।"

आखिरकार परिवार को रात में कश्मीर छोड देना पडा।

कितना कुछ बदल गया?

आरती कहती हैं, "अगले दिन खबर आई कि हमारा घर जला दिया गया है। घर जलाने की बात समझ में आ जाती है, लेकिन जो बात समझ में नहीं आती कि जिन बच्चों को चाचू इतने सालों से पढाते थे, उन्हीं बच्चों ने उन्हें पकडकर कहा कि आप निकल जाएं और आपको हमारा वतन छोडना है। यह कहना बहुत आसान है लेकिन करना बहुत मुश्किल। जिन घरों में हमारी पीढियां गुजरीं, हमें कह दिया कि तुम यहां से चले जाओ और हम जम्मू आ गए"।

उनके चेहरे पर बीते दो दशकों के घाव साफ नजर आते हैं। वापस आने के फैसले पर वह कहती हैं, "कश्मीरी संस्कृति के बारे में सुनती हूं, तो मुझे बहुत सुकून मिलता है। पुराने दिन याद आ जाते हैं। घर में कुआं था, हम बाल्टी नीचे डालते थे, उसमें पानी भरकर एक दूसरे पर फेंकते थे। बहुत मजा आता था। मेरी मुसलमान दोस्त त्योहारों पर हमारे घर आती थीं, ईद पर अपने घर ले जाती थीं। बीते 25 सालों ने सब कुछ बदल दिया।"

जम्मू में डोगरे लडके कश्मीरी लडकियों को 'कश्मीरी लोले, छोले' कहकर चिढाते थे। अच्छे घरों के रहने वाले बच्चे अब कैंपों में पढने लगे, टैंटों में रहने लगे, फकीरों की तरह खाना खाने लगे।

वापस आए कश्मीरी पंडितों के दिलों में घाटी से अपनी संस्कृति के खत्म हो जाने का डर बैठा हुआ है। वे मानते हैं कि वोट देना महत्वपूर्ण है, लेकिन वे ये भी कहते हैं कि वोट देने से उनके भविष्य पर असर नहीं पडेगा।

लेकिन क्या यह डर, असुरक्षा की भावना कुछ ज्यादा नहीं है?

विट्टी रैना कहती हैं, "हम ये नहीं कहते कि हम बाहर जाएंगे तो हमें कोई कुछ बोलेगा लेकिन हमारा पुराना डर खत्म नहीं हुआ है, उनकी वजह से हमें लगता है कि बाहर जाने से क्या फायदा।"

कश्मीरी पंडितों का आरोप है कि घाटी के स्थानीय लोग उन्हें सांप्रदायिक ताने देते हैं। उनके मुसलमान साथी उनसे कथित तौर पर इस्लाम धर्म अपनाने को कहते हैं जिससे उनका डर गहरा हो जाता है।

इस्लाम अपनाने का दबाव

सरकारी स्कूल में पढाने वाली आरती बताती हैं कि उनकी सहेलियों के साथ भी इसी तरह की घटनाएं हुई हैं जिससे उन्हें दु:ख होता है।

शेखपोरा में मेरी मुलाकात सातवीं कक्षा में पढने वाली पूजा (बदला हुआ नाम) से हुई। पूजा डॉक्टर बनना चाहती हैं। वो कहती हैं कि स्कूल में उनके साथी मुसलमान साथी कहते हैं कि हिंदुस्तान चोर है।

वह बताती हैं, "परसों मुझसे छोटी एक लडकी ने कहा कि आप इस्लाम कुबूल कर लो और आपके धर्म में कुछ नहीं है। हम मम्मी से कहते हैं कि आप वापस जम्मू चलो, मगर वह मानती ही नहीं हैं। मैं मम्मी को रोज बोलती हूं कि आपको श्रीनगर आने का इतना लालच कैसे आ गया। मम्मी बोलती हैं कि आपके भविष्य के लिए आई हैं।" यह कहकर वो फफककर रोने लगीं।

बच्चों के साथ हुई ऐसी घटनाएं कश्मीरी पंडितों की सोच पर भारी प्रभाव डालती हैं। वो चाहते हैं कि उनके बच्चे हिंदू ग्रंथों को जानें, पढें और समझें। पूजा का आरोप है कि जब विशेष दिनों में स्कूल में इस्लामी प्रार्थना होती है तो उन्हें भी सभा का हिस्सा बनना पडता है।

पूजा के ही एक साथी ने भी ऐसी ही शिकायत की। उसने कहा कि जब स्कूल में इस्लामी प्रार्थना होती हैं तो वो गायत्री मंत्र पढते हैं। बच्चों का कहना है कि वो ऐसी घटनाओं की शिकायत अध्यापकों, प्रिंसिपल से करने से डरते हैं।

चुनाव में व्यस्तता के कारण प्रशासन के किसी अधिकारी से इस विषय में बात नहीं हो पाई, लेकिन श्रीनगर में कांग्रेस अध्यक्ष अब्दुल गनी खान कहते हैं कि ऐसी इक्का-दुक्का घटनाएं हो सकती हैं लेकिन उन्होंने कभी ऐसी शिकायतें नहीं सुनीं। दूसरे कुछ स्थानीय लोगों ने भी यही कहा।

अब्दुल गनी खान मानते हैं कि ये पंडितों के ऊपर है कि वो घाटी में वापस आना चाहते हैं या नहीं। वो कहते हैं कि पंडितों की आज की पीढी जो दो दशकों तक घाटी से बाहर रही वह खुद भी वापस नहीं आना चाहती क्योंकि वो कश्मीर को जानते ही नहीं।
विज्ञापन

हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चे सांप्रदायिक सोच रखें

उधर बच्चों के मां-बाप कहते हैं कि उन्हें समझ नहीं आता कि वो अपनी शिकायतें किसके पास ले जाएं। वो बच्चों के डर, शिकायत को घाटी को कट्टर इस्लामी रंग दिए जाने की कोशिश के तौर पर देखते हैं।

पूजा की मां ने बताया, "ऐसे बर्ताव के कारण बच्चों में सांप्रदायिक भावना होती है। हम चाहते हैं कि कैंपस के भीतर बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था हो।"

ऐसी घटनाएं क्या इक्का-दुक्का हैं या फिर कितनी फैली हैं, यह कहना संभव नहीं लेकिन कश्मीरी पंडितों का आरोप है कि घाटी में खुले नए स्कूलों में बढते इस्लामीकरण में खुद के लिए जगह नहीं ढूंढ पा रहे है।

उधर, स्थानीय कश्मीरी मुसलमान कहते हैं कि वो पंडितों का वापस घाटी में स्वागत करते हैं लेकिन जब वो खुद असुरक्षित हैं, तो पंडितों की सुरक्षा की गारंटी कैसे ली जा सकती है। कुछ स्थानीय कश्मीरी मुसलमान पंडितों के वापस आने के मसले को राजनीतिक स्टंट के तौर पर भी देखते हैं।

उधर आरती कहती हैं, "हम उन बच्चों को दोष नहीं देते। उन्होंने जो बातें अपने घरों में सुनी हैं, वो वही दोहराते हैं। लेकिन हमारे बच्चे सोचते हैं कि वो ऐसा क्यों बोल रहे हैं। हम क्यों भागे थे? ऐसे सवालों के जवाब हम बच्चों को देना नहीं चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चे सांप्रदायिक सोच रखें।"

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें