गब्बर, बसंती, जय, वीरू… बेहद कम फिल्म प्रेमी होंगे जो फिल्म शोले के इन किरदारों से वाकिफ नहीं होंगे। लेकिन क्या आपने लद्दाखी भाषा में बनी शोले के बारे में सुना है।
या कहें कि लद्दाख के फिल्म उद्योग के बारे में सुना है? यहां 'भाग मिल्खा भाग' और 'थ्री इडियट्स' जैसी कई फिल्में शूट हुई हैं लेकिन मुझे अंदाजा भी नहीं था कि लद्दाख में भी फिल्म इंडस्ट्री है जो अपने आप में बेहद दिलचस्प और अनोखी है।
यू ट्यूब पर लद्दाखी शोले देखने के बाद मैंने लद्दाख के फिल्म उद्योग के लोगों से मिलने की ठानी। तलाश शुरू हुई लद्दाखी शोले की बसंती से।
नॉरजुम लद्दाख की सबसे मशहूर युवा अभिनेत्रियों में से एक है जो लेह से 26 किलोमीटर दूर माटो गांव से हैं। मजे की बात ये है कि नॉरजुम असल में सरकारी कर्मचारी हैं- वे लेह में लोक निर्माण विभाग में काम करती हैं।
लद्दाख में आपको ज्यादातर हीरो, हीरोइन, फिल्मकार, कैमरामैन, एडिटर ऐसे ही मिलेंगे। वे आम दिनों में टैक्सी ड्राइवर हैं, टीचर हैं, दुकानदार हैं या गाइड हैं। लेकिन गर्मियों में जब फिल्म शूट होती है, यही लोग फिल्म क्रू के सदस्य बन जाते हैं।
नॉरजुम से मिलने और उन्हें मनाने के लिए खासी मशक्कत करनी पडी। आखिरकार जब वो तैयार हुईं तो बताया गया कि वे इस समय अपने सरकारी दफ्तर में ड्यूटी पर हैं।
लेह में उनके सरकारी दफ्तर के पीछे कुछ देर पैदल चलने के बाद एक शांत सी जगह पर हम मिले। लद्दाख की सबसे बडी अभिनेत्री मेरे साथ पैदल चल रही थी और मुझे थोडी हैरत हो रही थी कि आस-पास के लोग सामान्य तरीके से अपना काम किए जा रहे थे।
सरकारी कर्मचारी होते हुए फिल्मों में काम? मेरे इस सवाल को भांपते हुए नॉरजुम ने बताया, "मैं सामान्य तौर पर सरकारी दफ्तर में काम करती हूं। जब कोई शूटिंग होती है तो शनिवार-रविवार को शूटिंग कर लेती हूं। जब आउटडोर शूटिंग होती है तो मैं अपने सीनियर को बताती हूं कि मुझे शूटिंग के लिए छुट्टी चाहिए। वो अकसर मान जाते हैं और फिर कोई दिक्कत नहीं होती। यहां आपसे कोई स्टार की तरह बर्ताव नहीं करता। हां गांवों में जाओ तो लोगों में थोडी उत्सुकता रहती है।"
दुकानदार भी, कैमरामैन भी
लद्दाख में हर साल चार-पांच फिल्में बनती हैं, दो से पांच लाख के बजट की ये फिल्में गर्मियों में शूट होती हैं। लद्दाख का फिल्म उद्योग छोटा सही लेकिन लोग इनका भरपूर आनंद उठाते हैं। सर्दियों में कडी ठंड की वजह से यहां का जीवन काफी कठिन रहता है, मनोरंजन के साधन कम है। तो लोग इन्हीं फिल्मों से अपना मनोरंजन करते हैं।
लेह में रहने वाले ताशी दावा मोबाइल एक्सेसरिज की दुकान चलाते है लेकिन वो लद्दाखी फिल्मों में बतौर कैमरामैन और एडिटर भी काम करते हैं। हाल में उनकी डॉक्यूमेंट्री को लद्दाख फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार भी मिला।
दुकानदार और कैमरामैन के बीच के इस घालमेल के बारे में ताशी कहते हैं, "मैं फिल्मों के साथ जुडा हुआ हूं। लेकिन सिर्फ फिल्म लाइन के पैसों से मेरा घर नहीं चल सकता। बाकी समय मैं अपनी दुकान पर बैठता हूं। जब मैं शूट कर रहा होता हूं तो मेरी पत्नी दुकान चलाती है। पैसे कमाने के लिए मैं हर छोटा बडा काम करता हूं। यहां आप ये नहीं सोच सकते कि फिल्म लाइन में हैं तो बहुत बडे हो गए।"
सबकी अमूमन यही कहानी है। मोतुप लद्दाख के लोकप्रिय युवा हीरो हैं। पिता की दुकान पर उनका मन नहीं लगता था। फिर एक दिन एक दोस्त के साथ मिलकर लेह में म्यूजिक वीडियो शूट किया और अपनी दुकान के बाहर टीवी पर चला दिया। बस फिर क्या था बाजार में बेतहाशा भीड जुट गई और पुलिस को बीच बचाव करना पडा।
मोतुप बताते हैं कि उनके वीडियो की इतनी डिमांड हुई कि उन्होंने सोचा क्यों न वीडियो की जगह फिल्म का हीरो बना जाए। वे बताते हुए खुद ही भूल जाते हैं कि वे हीरो, निर्देशक या कैमरामैन, या फिर सब कुछ हैं।
हिमाचल, नेपाल में भी लोकप्रिय
स्थानीय लोग बताते हैं कि उन्हें मेलोड्रामा, रोमांस वाली पारिवारिक फिल्में पसंद हैं और नाच गाना होना तो जरूरी है- बॉलीवुड स्टाइल। हालांकि लेह भर में एक ऑडिटोरियम है जहां फिल्में दिखाई जाती है और वहां से गांव-गांव ले जाकर इन फिल्मों को दिखाया जाता है।
यहां पहली बार फिल्म बनाने के बारे में सोचने वालों में वरिष्ठ फिल्मकार और अभिनेता चेतन का नाम आगे आता है।
वे बताते हैं, “1989 की बात है। मैंने एक नाटक के लिए कहानी लिखी। यहां थिएटर की परंपरा रही है। एक दिन यूं ही मैंने बोल दिया कि इस पर फिल्म बनाएंगे। जब नाटक हिट हो गया तो सब कलाकार कहने लगे, 'क्यों न फिल्म बनाने की कोशिश करें, देखते हैं क्या होता है'। हालांकि हमें ठीक से अंदाजा नहीं था कि कैसे क्या करना है। कहीं से कैमरा मिला, फिल्म शूट हुई, गांवों में हमने दिखाई। वहीं से शुरुआत हुई।”
तब से लद्दाख फिल्म इंडस्ट्री आगे बढी है। लद्दाख फिल्म फेस्विटल के निदेशक मेल्विन विलियम्स बताते हैं कि लद्दाखी फिल्में लद्दाख में ही नहीं बल्कि हिमाचल प्रदेश, नेपाल में भी लोकप्रिय हैं।
चेतन ने बताया कि एक बार दिल्ली हवाई अड्डे से आते वक्त उनका सामान ज्यादा हो गया तो किसी अजनबी सह यात्री ने उनका सामान अपने नाम पर करवाकर उनकी मदद की। बाद में उस यात्री ने चेतन को बताया कि वो हिमाचल में लद्दाखी फिल्में देखते हैं और बतौर अभिनेता चेतन की फिल्में देख चुके हैं और उन्हें पहचानते हैं।
बजट नहीं, तकनीक नहीं, तो क्या हुआ
अब कोशिश यही है कि इस पहचान को और आगे तक ले जाया जाए। लद्दाख को कुदरत ने गजब की खूबसूरती बख्शी है, इसलिए शूटिंग लोकेशन की कोई कमी नहीं है। पर यहां अब भी प्रशिक्षित फिल्म क्रू नहीं है, लाइटिंग, मेकअप आदि के गुर अभी लोग सीख रहे हैं। पिछले कुछ सालों में राकेश मेहरा, श्याम बेनेगेल जैसे फिल्मकार लद्दाख से जुडे हैं। जैसे जैसे बाहरी दुनिया से संपर्क बढ रहा है, लद्दाखी फिल्मों की स्क्रिप्ट, तकनीक और सोच में विविधता आ रही है।
लद्दाख में इन फिल्मों की लोकप्रियता और मांग में कोई कमी नहीं है। बडा बजट न सही, तकनीक न सही, सिनेमाहॉल न सही लेकिन यहां इनके पास अपने अपने सलमान, शाहरुख, करीना, कटरीना हैं।
तो कभी मौका लगे तो आप भी लद्दाखी फिल्म का आनंद लीजिए। हां ये जरूर हो सकता है कि यही सितारे आपको लद्दाख के बाजार में दुकान पर, किसी स्कूल में, किसी सरकारी दफ्तर में भी काम करते हुए मिल जाएं। नॉरजुम की तरह जो बसंती और सरकारी कर्मचारी दोनों का किरदार बखूबी निभा लेती हैं।