कठुआ। दुनिया के सात उपमहाद्वीपों में से दो की सबसे ऊंची चाेटियों पर चढ़ाई करने वाली सुमन वर्मा को अंतरराष्ट्रीय आइकन अवार्ड से नवाजा गया है।
इसके साथ ही उनको डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम भारतीय रत्न सम्मान भी हासिल हुआ है। बीते साल सुमन ने अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी माउंट किलिमंजारो तो वहीं इस साल यूरोप की सबसे ऊंची चोटी माउंट अल्ब्रूस को दुर्गम परिस्थितियों में भी नाप डाला था। उनको गोल्ड मेडल और प्रमाण पत्र विभागीय पोस्ट से प्राप्त हो चुके हैं। नवंबर और दिसंबर में सम्मान समारोह होगा।
हीरानगर के एक छोटे से गांव कड़ेत्तर की बेटी सुमन वर्मा अब माउंट एवरेस्ट चढ़ने के लिए बेताब हैं। पेशे से सीआईएसएफ में कांस्टेबल सुमन बेहतरीन एथलीट भी रह चुकी हैं। सुमन ने बताया कि उन्होंने माइनस 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान के बीच रूस के माउंट अल्ब्रूस की चढ़ाई की। इसी साल 15 अगस्त को सम्मिट शुरू किया था लेकिन मौसम खराब होने के चलते यह पूरा नहीं हो पाया। इस दौरान 70 से 90 किलोमीटर प्रति घंटे की हवाओं ने परेशानी बढ़ा दी। एक पल के लिए तो मुश्किल लगा लेकिन हिम्मत नहीं हारी और दूसरा प्रयास किया। 17 अगस्त 2024 की सुबह आठ बजे उन्होंने माउंट अल्ब्रूस की चढ़ाई कर तिरंगा फहरा दिया।
सुमन ने बताया कि माउंटेनियरिंग को लेकर उनका शौक 2022 में शुरू हुआ। बकौल सुमन, एक समय पर बीमार होने से ओलंपिक्स में जाने का सपना टूटा तो जिंदगी से यूं हार न मानने की ठानी। उन्होंने बताया कि 2022 में हैदराबाद में पोस्टिंग के दौरान उन्होंने बेसिक और फिर एडवांस माउंटेनियरिंग का कोर्स अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीटयूट ऑफ माउंटेनियरिंग एंड अलाइड कोर्सिज से किया। इसके बाद वर्ष 2023 के अगस्त महीने में 19 हजार 340 फीट पर अफ्रीका के सबसे ऊंचे कीलिमंजारो पहाड़ की चोटी चढ़ डाली। माउंट अल्ब्रूस के लिए यहीं से तैयारी शुरू हो गई और इस साल 18 हजार 510 मीटर पर इसे भी नाप डाला।
...........
ख्याति पाना लक्ष्य नहीं, रुढि़यों को तोड़ना है मकसद
सुमन ने बताया कि बतौर एथलीट उन्हें प्रदेश में अच्छी पहचान मिल चुकी थी। ऐसे में पर्वतारोहण ख्याति पाने का लक्ष्य नहीं है, बल्कि छोटे से गांव की कोई भी लड़की कोई भी बड़ा और दुनिया का सबसे बड़ा सपना देख सकती है। यही सच कर देखना मकसद है। इसमें परिवार का भी पूरा सहयोग रहा है। सुमन ने बताया कि उनके पिता शिक्षक और माता गृहिणी हैं। आज परिवार के पास बेटी की इस कामयाबी पर बधाई देने वालों का तांता लगा है। सुमन ने बताया कि इन पहाड़ों को चढ़ने के लिए कई बार त्याग भी करना पड़ता है। एक महीने की बमुश्किल मिलने वाली छुट्टी में तैयारी या फिर कोर्स करना होता है। ऐसे में साल भर के लिए परिवार से फिर दूरी बन जाती है। उन्होंने बताया कि रूस के इस पर्वत को चढ़ने में ही लगभग चार लाख रुपये का खर्चा हुआ है। माउंट एवरेस्ट के लिए इससे 10 गुना अधिक चाहिए। सरकार यदि चाहे तो उनका सपना सच हो सकता है।