बरसात के मौसम में इलाके में डायरिया और डिसेंटरी आफत बन कर आते हैं। विशेषतौर पर पहाड़ी और पिछडे़ गांवों में जहां स्वच्छ पेयजल की सुविधा नहीं है, वहां यह रोग जल्दी पैर पसारता है। वजह यह है कि आज भी ज्यादातर पहाड़ी और ग्रामीण अंचल के लोगों को नालों, पोखरों, कुओं और तालाबों का प्रदूषित पानी पीने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
ब्लाक मेडिकल अफसर डाक्टर लखविंद्र सिंह ने बताया कि यदि बरसात में कुछ सावधानियों पर अमल किया जाए तो डायरिया और डिसेंटरी से बचा जा सकता है। उन्होंने बताया कि डायरिया पीड़ित को फौरन नजदीकी चिकित्सा केंद्र ले जाना चाहिए। दूरदराज के गांवों में जहां चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहां रोगी को सबसे पहले ओआरएस का घोल पिलाना चाहिए।
यदि ओआरएस भी उपलब्ध नहीं है, तो एक गिलास उबले हुए पानी में नीबू का रस, शक्कर और चुटकी भर नमक मिलाकर रोगी को लगातार देते रहें। जब तक रोगी चिकित्सा केंद्र पर नहीं पहुंच पाता। बरसात में पानी उबाल कर अथवा उसमें क्लोरीन की गोलियां डालकर ही उसका सेवन करना चाहिए। क्लोरीन की गोलियां चिकित्सा केंद्रों से मुफ्त हासिल की जा सकती हैं।