दो दिनों से गोलियों की आवाज शांत होने के बाद भी सीमांत ग्रामीण घरों को नहीं जाना चाहते हैं। उनका कहना है कि अब एक बार में स्थायी हल कर दें तभी घरों को जाऐंगे।
इसके लिए चाहे केंद्र सरकार योजना बनाए या फिर राज्य सरकार उन्हें फर्क नहीं पड़ता है लेकिन इन हालात का स्थायी हल उनके लिए अहम है।
शिविर में ठहरे नेक चंद ने कहा कि छह दशकों ने अधिक समय में वह कई बार इस प्रकार घरों को छोड़कर राहत शिविरों में आए हैं।
जब भी वापस जाते हैं तो मन में एक ही डर होता है कि अब न जाने कब फिर से घर छोड़ने न पड़े। उन्होंने कहा कि उनकी तो अब उम्र हो चली है लेकिन बेटों और पोतों की चिंता तो है ही अगर उन्हें भी सारी उम्र यही सब झेलना है तो फिर क्या लाभ।
वहीं विशंभर दास ने कहा कि गोलियों की गढ़गढ़ाहट तो उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गई है लेकिन अब वे इस गोलियों तंग आ चुके है और इन गोलियों का स्थायी हल उनकी समस्या का समाधान है।
वहीं शिविरों में आए किसान तारा चंद ने कहा कि फसल योग्य भूमि तो पहले ही तारबंदी के पार जा चुकी है।
उसके बाद जो बची थी अब उस पर फसल पक गई है। फसल काटने का समय है लेकिन क्या करें गोलियों का डर अब फसल के नुकसान से अधिक है।