फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Kathua News: डिस्पेंसरी बनकर रह गया महात्मा गांधी जच्चा-बच्चा अस्पताल

विज्ञापन
महात्मा गांधी जच्चा-बच्चा अस्पताल। संवाद
विज्ञापन
- विशेषज्ञ डॉक्टरों के अभाव में जीएमसी का रेफरल स्टेशन बना नजला, खांसी और बुखार की ही मिलती है दवा
विज्ञापन



संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। कभी जच्चे-बच्चे को बेहतर सुविधा प्रदान करने के लिए शहर के बीचोंबीच बना महात्मा गांधी जच्चा-बच्चा अस्पताल अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर यहां एक चिकित्सा अधिकारी की नियुक्ति की गई है। वर्तमान में अस्पताल एक डिस्पेंसरी बनकर रह गया है। यहां सिर्फ नजला, खांसी और बुखार की दवा ही मिलती है।
वास्तव में वर्ष 2018 में जिले को राजकीय मेडिकल कॉलेज मिलने के बाद अस्पताल में स्वीकृत सभी 13 पद यहां से हटा दिए गए। इसमें पांच विशेषज्ञ डॉक्टर-स्त्री रोग विशेषज्ञ, फिजीशियन, सर्जरी, बाल रोग विशेषज्ञ और एनेस्थेसिया के पद भी थे। वहीं, स्वास्थ्य अधिकारियों की मानें तो भविष्य में इस अस्पताल को जच्चा-बच्चा के रूप में चलाने की सरकार की कोई योजना नहीं है। इसकी मुख्य वजह यह है कि वर्ष 2015 में जच्चा-बच्चा अस्पताल बनाने के साथ परिसर में एक ब्लड बैंक, ऑपरेशन थिएटर सहित एक अतिरिक्त ब्लॉक बनाने की योजना थी जिसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
विज्ञापन

सरकारी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) बनने के बाद अस्पताल इमारत में ही पहले एमबीबीएस की क्लासों की व्यवस्था की गई। मौजूदा समय में अस्पताल की इमारत का ज्यादातर भाग होम्योपैथिक कॉलेज और अस्पताल को सौंपा जा चुका है। कागजों में तो यह जच्चा-बच्चा अस्पताल है, लेकिन यह एक डिस्पेंसरी बनकर रह गया है। जिसका स्थानीय लोग समय-समय पर विरोध करते आ रहे हैं।
-

कई बार शुरू हुई कवायद, आगे नहीं बढ़ पाया काम
दरअसल वर्ष 2003 में जम्मू-कश्मीर में दो जच्चा-बच्चा अस्पतालों को मंजूरी मिली। अनंतनाग का जच्चा-बच्चा अस्पताल तो बेहतर तरीके से सुचारु हुआ, लेकिन कठुआ के जच्चा-बच्चा अस्पताल को लेकर कवायद कभी भी आगे नहीं बढ़ पाई। महात्मा गांधी जच्चा-बच्चा अस्पताल की सुविधाएं मंजूर होने के बाद भी जनरल अस्पताल से अधिक नहीं रहीं। प्राथमिक चिकित्सा केंद्र की तरह चलते आए इस अस्पताल को लेकर कई बार कवायद शुरू हुई और इसे 100 बेड के अस्पताल के साथ संपूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस करने के वादे भी हुए। डीपीआर से लेकर मंत्रियों के दौरे और काम शुरू करवाने की औपचारिकताओं से जच्चा-बच्चा अस्पताल आगे नहीं बढ़ पाया।

बिना तकनीशियन के एक्स-रे मशीन हुई खराब

स्थापना के बाद से यहां एक एक्स-रे मशीन स्थापित की गई थी। जो अब खराब पड़ी है। डीपीसी के बाद एक्स-रे तकनीशियन ईसीजी तकनीशियन बन गया और मौजूदा समय में ईसीजी मशीन को संभाल रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार यहां अस्पताल जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करवा पा रही है जिसका खामियाजा शहरवासियों को भुगतना पड़ रहा है। अस्पताल में वर्तमान में सिर्फ ईसीजी और प्रयोगशाला की ही सुविधा उपलब्ध है।
विज्ञापन




वर्तमान में जच्चा-बच्चा अस्पताल को चलाने के लिए न तो मैनपावर है और न बैकअप पावर है। इसके अलावा अस्पताल की जरूरतों के मुताबिक न तो ब्लड बैंक है और न ही ऑपरेशन थिएटर की उपलब्धता है। जिससे इसे सुचारू बनाया जा सके। स्वीकृत विशेषज्ञ डॉक्टर और स्टाफ पदों को भरने का निर्णय सरकार ने लेना है। जीएमसी के नजदीक होने से मुझे नहीं लगता इसको भविष्य में कार्यात्मक बनाया जाएगा।
-विजय रैना, जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें