संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। शहर के वार्ड 2 में संगीतमय रूहानी सत्संग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें बड़ी संख्या में भक्तों ने भाग लेकर कथावाचक सुभाष शास्त्री द्वारा पेश किए जा रहे मधुर भजनों का श्रवण किया। वहीं शास्त्री ने भक्तों को सत्संग का महात्म बताते हुए कल्याण के इस मार्ग पर चलने की नसीहत दी।
अपने प्रवचन में शास्त्री जी महाराज ने सत्संग के विषय में बताते हुए कहा कि सत्य का संग, संतों का संग, ग्रंथों का संग ही सत्संग होता है। उन्होंने भक्तों को कुसंग से बचने के लिए कहा, क्योंकि संग का रंग मनुष्य पर अवश्य पड़ता है जो उसे सदमार्ग से भ्रमित कर सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर हम अपने रुमाल में कुछ समय के लिए खुशबूदार फूल रखें और फिर उन्हें निकाल दें। उन फूलों की सुगंध बहुत देर तक आपके रुमाल में रहेगी। इसके विपरीत आप अपने दूसरे रुमाल में पीसी हुई मिर्ची कुछ पल के लिए रखे और फिर निकाल का झाड़ दें, तब भी रूमाल में मिर्ची का प्रभाव आप अनुभव करेंगे। लिहाजा आप को तय करना है कि आप कुसंग के साथ या फिर सत्संग के साथ रहना चाहते है। शास्त्री जी ने आगे सत्संग का महत्व समझाते हुए कहा कि यदि आप जिस गाड़ी को चलाते है तो उसे समय-समय पर सर्विस के लिए गैराज में भेजते हैं, ताकि उसकी सफाई हो सके। सन्त-मुनियों की धर्म सभाएं भी गैरेज जैसी है जहां तुम्हारे दिल-दिमाग रूपी, इंजन की धुलाई की जाती है। हमारा जीवन भी एक संकल्प की गाड़ी है। अगर इस गाड़ी में हौंसले के पहिए, धर्म का इंजन, कर्म का ईधन, मर्यादा का एक्सीलेटर, अनुशासन का ब्रेक और टूल बाक्स में ज्ञान-चरित्र के औजार हों तो यह मनुष्य रूपी गाड़ी निश्चित ही मोक्ष की मंजिल तक पहुंच जाती है। लिहाजा सत्य का संग अवश्य करें, इसमें आपका भला ऊपर रहता है जो दिखता नहीं है, जैसे दूध में मक्खन नहीं दिखता।