कठुआ। तीन पंचायतों की 13 हजार आबादी के लिए अपने घर तक सीधे संपर्क की उम्मीदों का जुथाना पुल आज भी पूरा नहीं हुआ है। पिछले सात वर्ष से अधूरा पड़ा है। 30 करोड़ की राशि से तैयार होने वाले इस पुल के अधूरे रहने के साथ ही ग्रामीणों के सपने भी अधूरे ही रह गए हैं। जखोल से जुथाना के बीच में उज्ज दरिया पर बन रहे जुथाना पुल का काम कीड़ियां गंडियाल के पुल के साथ शुरू किया गया था। कीड़ियां गंडियाल का पुल बनकर तैयार हो गया, लेकिन यह पुल आज तक अधर में लटका हुआ है।
आज हालात यह हैं कि लोग जान जोखिम में डालकर इसके अधूरे पिलर के सरियों को मोड़कर डेढ़ फुट के संकरी पट्टी पर चलते हैं। जो किसी भी सूरत में मौत के कुंए से कम नहीं है। इस दौरान कोई भी नीचे देख ले तो सांसें अटक जाएं। लेकिन रोजाना यहां से लगभग दो सौ स्कूली बच्चे और सैकड़ों ग्रामीण इसी रास्ते से होकर अपनी मंजिल तक पहुंचते और लौटते हैं।
केंद्रीय सड़क फंड्स (सीआरएफ) के तहत तीस करोड़ से इस परियोजना का काम निर्धारित किया गया, जो वर्ष 2016 में शुरू हो गया। आधे-अधूरे काम के बीच सीआरएफ बंद हो गया, जिसके बाद इसे लंबित परियोजनाओं में तब्दील कर दिया गया। अब सालाना मिलने वाला एक आधा करोड़ और समय के साथ बढ़ती जा रही निर्माण सामग्री की लागत के चलते यह लंबित परियोजना कभी न पूरी हो सकने वाली परियोजना बनकर रह गई है। अंधेरा ढलने के बाद ग्रामीणों का उज्ज के पार आना लगभग नामुमकिन हो जाता है, तो वहीं सुबह स्कूली बच्चों की लंबी रेल इस पुल को जान जोखिम में डालकर पार करती है। सरकार का शुक्रिया करते न थकने वाली यह पंचायतें अब सरकार से यह जानना चाहती हैं कि आखिर उनकी गलती क्या थी।
कठुआ से अपनी बेटी के घर आई सुमित्रा देवी अस्सी वर्ष की हैं। बेटी की शादी उन्होंने जुथाना इलाके में की। पहले दरिया को पार कर जाते थे तो भी जान जोखिम में होती थी। अब बेटी के घर जाना हो तो मौत के कुंए से गुजरना पड़ता है। पहले जुुगाड़ कर पुल पर चढ़ने के लिए लगाई लोहे की खड़ी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं और फिर दोनों तरफ मौत को देखकर आगे पुल पार करना पड़ता है। सुमित्रा देवी ने कहा कि बेटी से मिलने के लिए इस बार भी ऐसे ही आई हैं। उम्मीद है कि अगली बार आना हुआ तो तैयार पुल से गुजर सकेंगी।
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गांव में नहीं पहुंचती बरातें, जखोल में ही निपटाई जाती हैं रस्में
जुथाना निवासी जोगिंद्र सिंह ने बताया कि इन तीन पंचायतों का हाल यह है कि लोग अपनी बेटियों की शादी इस ओर करने से परहेज करते हैं। यदि संयोगवश शादी जुड़ भी जाए तो इंतजाम दरिया के पार जखोल में किया जाता है। यहीं रस्में निभाई जाती हैं जिसके बाद डोली लेकर यहां से ही गांव में इस पुल को पार कर लोग पहुंचते हैं। आजादी के 75 वर्षों की इस इलाके को यह पहली सौगात होती, लेकिन यह साल भी ऐसे ही निकल गया।
उन्होंने बताया कि गर्भवती और बीमार बुजुर्गों को पुल से पार करवाने में भारी दिक्कत आती है। कई पीढ़ियां पुल के इंतजार में चली गईं। तीन साल में पूरा होने वाला यह पुल आठ साल बाद भी अधूरा है।
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नेता आए और फीता काट, नारियल फोड़ चले गए, फिर मुड़कर नहीं देखा
जुथाना निवासी अशोक सिंह ने बताया कि इन तीन पंचायतों के लोगों ने भी जी-जान से केंद्र की सत्तारूढ़ सरकार को वोट दिए। पूर्व डिप्टी सीएम के विधानसभा हल्के के इस इलाके में ग्रामीणों ने उनतक भी कई बार अपनी गुहार लगाई। बताया कि डीडीसी चुनाव में सदस्य बनीं रिम्मी चाढ़क भी आईं और काम शुरू होने का भरोसा दिलाकर नारियल फोड़कर चली गईं। इसी तरह से लगभग छह बार इस पुल के फीते कटते रहे और नारियल फूटते रहे। लेकिन लोगों के सपने अधूरे ही रहे।
आज पुल पर निर्माण एजेंसी द्वारा बांधे गए सरियों को मोड़कर, बीच से संकरी जगह बनाकर लोग गुजर रहे हैं। कहा कि कीड़ियां गंडियाल पुल के साथ ही पुल का काम भी सरकार ने शुरू करवाया। वो पुल जनसमर्पित हो गया लेकिन यहां के लोगों का पुल अधूरा है। उन्होंने कहा कि अब तो ऐसा लगता है कि यहां के लोगों ने कोई पाप किया है जो सरकार उन्हें भूल चुकी है।
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जुथाना पुल का निर्माण रुका हुआ है। यह लंबित परियोजनाओं में शामिल है। ठेकेदार की ओर से काम को आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है। ऐसे में इस परियोजना को यहीं बंद करने और फिर से टेंडर करवाने का सुझाव उच्च अधिकारियों को दिया गया है। उम्मीद है कि सोमवार को प्रबंध निदेशक की ओर से बुलाई गई बैठक में इसपर फैसला होगा। जिससे एक बार फिर से इसकी नई परियोजना तैयार कर, काम को पूरा करवाया जा सकेगा। वर्तमान में इस पुल का 70 से 75 फीसदी काम हो चुका है। लोगों को पुल से न गुजरने की हिदायत दी गई है, विभाग की ओर से चेतावनी के साइन बोर्ड भी लगाए गए हैं।
दिनेश नय्यर] डिप्टी जीएम, जेकेपीसीसी