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Kathua News: बेटी को सताती है पिता की याद, नौकरी की भी आस

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कठुआ। कारगिल युद्ध के दौरान हसीना अख्तर पहली कक्षा में पढ़ती थी कि सिर से पिता का साया उठ गया। बचपन में पिता को गंवाने का गम आज भी शहीद हवलदार अब्दुल करीम की बेटी हसीना को सताता है।
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खुदा से बस एक ही सवाल करती है कि आखिर उसकी क्या गलती थी जो इतनी छोटी सी उम्र ने उसे इतना दुख दिया। फिर देश के नाम दी गई शहादत को अपने दुख से बड़ा मानकर हसीना हर गम को भुला लेती है। हसीना का कहना है कि उसने भले ही अपने पिता को न देखा हो, लेकिन उनके पराक्रम की दास्तां सुनकर उनको आज भी अपने साथ ही महसूस करती है।
12 जैकलाई के शहीद हवलदार अब्दुल करीम का परिवार प्रदेश सरकार से आज रोजगार की आस रखता है। केंद्र सरकार ने पेट्रोल पंप की सुविधा देकर आर्थिक सहारा दिया। सेना हर तिमाही पर बाकायदा एक टीम भेजकर उनका हाल-चाल जानने के अलावा समस्याएं पूछती है, लेकिन पूर्व की राज्य सरकार ने कभी भी उनके परिवार की सुध नहीं ली। प्रदेश सरकार ने बलिदानी के पैतृक गांव उधमपुर में उनके सम्मान में गांव तक पक्की सड़क हाल में पहुंचा दी है, जिसे लेकर परिवार खुश है।
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बलिदानी हवलदार अब्दुल करीम के बेटे अब्दुल रफीक ने बताया कि उनके पिता ने दुश्मन से लोहा लेते हुए एक जुलाई 1999 को शहादत पाई थी। अब्दुल करीम की पत्नी गुड्डी बेगम भी तीन साल पहले चल बसीं। बेटी हसीना अख्तर ने बताया कि मूल रूप से उनका परिवार उधमपुर जिले का रहने वाला है, लेकिन इन दिनों वह कठुआ के तारानगर इलाके में किराये के मकान में रह रहे हैं। मुखिया की एक जुलाई 1999 को शहादत ने परिवार सदस्यों को झकझोर कर रख दिया लेकिन केंद्र सरकार और सेना ने जिस तरह से उन्हें सम्मान और सहायता दी, उससे उन्हें एहसास हुआ कि देश के लिए मर मिटने वालों की अहमियत है।
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