कठुआ। 1965 और 1971 के बाद 1999 में हुआ कारगिल युद्ध भारतीय सेना की गौरवगाथा का एक स्वर्णिम अध्याय है। इसमें देश भर से 527 जांबाजों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।
तीन महीने तक चले कारगिल युद्ध में कठुआ जिले के भी जांबाजों ने अपनी शहादत देकर मातृभूमि की रक्षा की थी। कठुआ जिले के विभिन्न इलाकों से सात जांबाज सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपने प्राण मातृभूमि की रक्षा के लिए न्योछावर कर दिए। मई महीने में शुरू हुए कारगिल युद्ध में जिला कठुआ से नौ जून 1999 को एक साथ दो-दो शहीदों की शहादत ने पूरे जिले को झकझोर कर रख दिया था। 12 जैक लाइट इन्फेंट्री के नायक पवन कुमार और हवलदार राजिंद्र सिंह दुश्मनों से लोहा लेते हुए बलिदान हुए थे। भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे गांव मीशा चक के नायक पवन कुमार की गौरवगाथा आज भी इलाके में गूंजती है तो सीमावर्ती इलाके के लोग पलायन और बार बार की गोलाबारी का दर्द भी भूल जाते हैं। वहीं बसोहली तहसील के गांव मारता नगरोटा के हवलदार राजिंद्र सिंह ने भी अपनी शहादत से सैकड़ों युवाओं में देशभक्ति का जज्बा भर दिया। 1999 के 16 जून को बसोहली के सवार गांव से सटे बटाई में भी शोक की लहर दौड़ गई। गांव के हवलदार जगन्नाथ 13 जैक राइफल में तैनात थे। कठुआ के तारानगर के रहने वाले 12 जैक लाइट इन्फेंट्री के हवलदार अब्दुल करीम ने एक जुलाई को अपनी शहादत दी। ठीक पांच दिन बाद छह जुलाई 1999 को राजपुरा सारथी कलां के रहने वाले लखविंद्र सिंह ने ऑपरेशन विजय को सफल बनाने की कड़ी में अपने रक्त से कारगिल की पहाड़ियों को सींच दिया। 12 जुलाई को सिपाही सरतूल सिंह की शहादत ने महानपुर के निकटवर्ती माड़ पट्टी गांव में लोगों को देशभक्ति से भर दिया। इसके बाद कठुआ के वार्ड छह निवासी रत्न चंद ने भी शहादत पाई थी।