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तेंदुओं, गिद्धों के साथ साथ पेंगोलिन की होगी रेडियो कॉलरिंग

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कठुआ। जसरोटा वन्यजीव अभयारण्य में तेंदुओं, गिद्धों और पेंगोलिन पर रेडियो कॉलरिंग होने जा रही है। वन्यजीव विभाग ने वैज्ञानिक तरीके से वन्यजीव संरक्षण प्रबंधन योजना को अनुमति दे दी है। इसके तहत विलुप्त हो रहे जंगली जानवरों की प्रजातियों पर नजर रखी जाएगी। इसके लिए ड्रोन और कैमरा ट्रैपिंग से मदद ली जाएगी।
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रेडियो कॉलरिंग से तेंदुओं के इलाके समझने और रिहायशी इलाकों में उनकी मौजूदगी पर नजर रखी जा सकेगी। तेंदुए अधिकतर किन क्षेत्रों में रह रहे हैं और किन क्षेत्रों में प्रजनन कर रहे हैं, इसका ब्योरा भी आने वाले वर्षों में वन्यजीव विभाग के पास उपलब्ध रहेगा।
वन्यजीव वार्डन विजय कुमार वर्मा ने कहा कि हाल ही में जसरोटा वन्यजीव अभयारण्य में प्रबंधन योजना को मुख्य वन्यजीव संरक्षक की ओर से अनुमति दी गई है। अगले दस वर्ष के लिए तैयार इस योजना से वैज्ञानिक तरीके से जंगली और लुप्तप्राय जानवरों का संरक्षण किया जा सकेगा। रेडियो कॉलरिंग से वन्यजीवों के व्यवहार का अध्ययन करने में मदद मिलेगी। इनके इर्द-गिर्द आने पर लोगों को भी समय पर सचेत करते हुए अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित हो सकेगा।
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1945 में संरक्षित वन क्षेत्र बना था जसरोटा
दस वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले जसरोटा अभयारण्य में 34 वर्ष बाद पहली बार वैज्ञानिक तरीके से निगरानी तंत्र विकसित होगा। वर्ष 1945 में आधिकारिक तौर पर जसरोटा को संरक्षित वन क्षेत्र की मान्यता मिली थी। 19 मार्च 1987 को जम्मू-कश्मीर सरकार ने इसे वन्य जीव अभयारण्य घोषित कर दिया था। अभयारण्य को खास तौर पर चीतल के संरक्षण के लिए तैयार किया गया है। तीन दशक बीतने के बाद अब यह अभ्यारण्य जंगली जानवरों की दर्जनों और विलुप्त हो रही प्रजातियों के संरक्षण का केंद्र भी बन चुका है।
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जानवरों की यह प्रजातियां हैं अभयारण्य में
सियार, नीलगाय, नेवला, साही, खरगोश, लंगूर, बार्किंग डियर, गोरल, तेंदुआ, सांभर, जंगली सूअर, मुश्कबिलाव, लोमड़ियों के अलावा कई लुप्त प्राय: और प्रदेश में पहली बार देखे गए पक्षियों की प्रजातियां भी जसरोटा अभयारण्य में पाई जाती हैं।
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ट्रैकिंग कैमरे में नजर आए पैंगोलिन
कठुआ। जसरोटा में विलुप्त प्रजाति का जानवर पैंगोलिन नजर आया है। अभयारण्य में वन्यजीव विभाग की ओर से लगाए गए कैमरा ट्रैप में पैंगोलिन की तस्वीरें कैद हुई हैं। इसे लेकर वन्यजीव महकमा काफी उत्साहित है। वार्डन विजय कुमार वर्मा ने बताया कि पिछले दिनों एक पैंगोलिन को विभागीय टीम ने रेस्क्यू किया था। इनकी मौजूदगी जानने के लिए लगाए गए ट्रैप कैमरा में कई पैंगोलिन पाए गए हैं।
वर्ष 2000 में पैंगोलिन की प्रजातियों के विलुप्त होने की कगार पर पहुंचने के बाद इसके शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। चीन और वियतनाम सहित कई देशों में दवाएं बनाने और मांस के लिए इनकी डिमांड है। पैंगोलिन की त्वचा का ऊपरी हिस्सा केरेटिन से बना होता है। माना जाता है कि बहुत सी बीमारियों के इलाज में इसकी मदद ली जा सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार पैंगोलिन चींटियां खाते हैं। एक अनुमान के अनुसार एक पैंगोलिन साल में करीब सात करोड़ चींटियां खा लेता है। यह उन चीटियों को शिकार बनाता है, जो फसलों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। साथ ही बड़े पशुओं के लिए भी बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती हैं। इसलिए पैंगोलिन को पर्यावरण एवं जैव विविधता के लिए बहुत जरूरी माना गया है।
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